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वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

by सदानन्द योगीन्द्र

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished314 pages

Page 152 of 314

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Page 152

१३८ वेदान्तसार
(२) दम-चक्षुः, श्रोत्र, रसना, घ्राण एवं त्वक् नामक पञ्चज्ञानेन्द्रियाँ
अपने-अपने विषयों को ग्रहण करने के लिए लालायित रहती हैं।
जैसे-नेत्रेन्द्रिय सुन्दरवस्तु को देखने के लिए व्याकुल रहती है तो श्रोत्रेन्द्रिय
मधुरध्वनि सुनने के लिए; इसीप्रकार रसनेन्द्रिय स्वादिष्ट व्यञ्जन खाने के
लिए बेचैन रहती है। इन सभी को इन सांसारिक भोगसामग्रियों से बलपूर्वक
रोककर ब्रह्मसाक्षात्कार के साधनभूत 'श्रवण-मनन' आदि में लगाना 'दम'
कहलाता है।
इसप्रकार 'शम' और 'दम' में केवल इतना ही अन्तर है कि वहाँ
अन्तरिन्द्रिय मन को बाह्य सांसारिकविषयों से हटाकर श्रवण, मनन आदि
ब्रह्मज्ञान के साधन में लगाया जाता है, जबकि 'दम' में पञ्चज्ञानेन्द्रियों को
उन-उनके विषयों से रोकते हुए ब्रह्मसाक्षात्कार के साधन श्रवण-मननादि में
लगाया जाता है। यद्यपि ज्ञानेन्द्रियों पर भी 'मन' का नियन्त्रण होने के कारण
प्रबलता 'शम' की ही माननी होगी।
(३) उपरति-ब्रह्मसाक्षात्कार के साधनस्वरूप श्रवण, मनन, निदिध्यासन
आदि के अतिरिक्त सांसारिकविषयों से हटायी हुई इन्द्रियाँ पुनः उन विषयों
में न जा सकें, यह जिस वृत्ति द्वारा किया जाता है, उसे 'उपरति' कहते हैं।
इसप्रकार 'उपरति' मन का वह कार्यव्यापार है, जो नियन्त्रित की गयी
इन्द्रियों को उनके विषयों की ओर पुनः जाने से रोकता है। इसप्रकार
उपरति, शम एवं दम में अत्यन्तसूक्ष्म अन्तर रहता है।
इसी प्रसङ्ग में ग्रन्थकार 'उपरति' की दूसरी परिभाषा भी प्रस्तुत करते
हैं-संध्यावन्दन, अग्निहोत्र आदि जो नित्यनैमित्तिककार्य शास्त्रों में
गृहस्थादिकों के करने के लिए बताए गए हैं, संन्यास आश्रम को स्वीकार
करके शास्त्रोक्तरीति से उनका परित्याग करना भी 'उपरति' कहलाता है।
दर्शनशास्त्र, शमादि के समान ही संन्यास को भी आत्मज्ञान का
महत्त्वपूर्ण साधन स्वीकार करता है, क्योंकि यज्ञादिकार्यों में लगे रहने के
कारण तथा ब्राह्मणत्व, क्षत्रियत्व विषयक विरोधी भावनाओं के बने रहने से
साधक वेदान्त के तत्त्वों पर भलीभाँति विचार करने में समर्थ ही नहीं हो
पाता है। इसलिए मुमुक्षु के लिए 'संन्यास' की अनिवार्यता प्रतिपादित की
गयी है तथा विधिपूर्वक त्याग से अभिप्राय है-सर्ववेदस् यज्ञादि करने के
बाद साधक संन्यास की दीक्षा ग्रहण करता है तथा इसीसमय शास्त्रोक्त रीति
से वह नित्यनैमित्तिककर्मों के परित्याग का भी संकल्प लेता है, नित्यादि