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वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

by सदानन्द योगीन्द्र

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished314 pages

Page 151 of 314

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Page 151

अनुबन्ध चतुष्टय १३७
अनुवाद-शम आदि तो (वस्तुतः) शम, दम, उपरति, तितिक्षा, समाधान,
श्रद्धा नाम वाले हैं। शम-श्रवण आदि से अतिरिक्त (सांसारिक) विषयों से
मन को रोकना ही शम है। बाह्य इन्द्रियों का उन (श्रवणादि) से अतिरिक्त
विषयों से रोकना दम है। (बाह्यविषयों से) रोकी गयी इन (इन्द्रियों) को
उस (ब्रह्मादि) से अतिरिक्त विषयों से पूर्णतया अवरुद्ध करना ही उपरति है
अथवा शास्त्रोक्त (नित्यादि) कर्मों का (सन्यासाश्रम में) विधिपूर्वक
परित्याग (ही उपरति है)। सर्दी-गर्मी (सुख-दुःख) आदि द्वन्द्वों को सहन
करना ही तितिक्षा है। पूर्णतया नियन्त्रितमन को श्रवण आदि तथा उनके
अनुकूल विषयों में भलीप्रकार लगाना ही समाधि है। गुरु द्वारा उपदिष्ट
वेदान्त के वाक्यों में विश्वास श्रद्धा है।
मोक्ष की इच्छा ही मुमुक्षुत्व है। इसप्रकार की विशेषताओं से युक्त हुआ
प्रमाता अधिकारी है। 'जितेन्द्रिय ही शान्तचित्त रहता है' इत्यादि श्रुतिवचन
भी है।
'चन्द्रिका' - ग्रन्थकार ने साधनचतुष्टय का उल्लेख करते समय शमादि
षट्सम्पत्ति कहकर तृतीय साधन का संकेतमात्र किया था। प्रस्तुत अंश में
उन सभी का नामोल्लेख करते हुए उन्हें परिभाषित करते हैं।
शमादि से यहाँ क्रमशः शम, दम, उपरति, तितिक्षा, समाधान, श्रद्धा इन
छः से अभिप्राय ग्रहण करना चाहिए। इन छः को ग्रन्थकार ने सम्पत्ति
इसलिए कहा क्योंकि ये ब्रह्मज्ञान के मार्ग को प्रशस्त करते हैं। अतः
तत्त्वज्ञान अथवा मोक्षप्राप्तिरूप कार्य में ये छहों सम्पत्तिस्वरूप हैं। तत्पश्चात्
क्रमशः इनकी व्याख्या करते हैं-
(१) शम-जिसप्रकार भूखा व्यक्ति अपनी भूख शान्त करने हेतु उसके
साधनस्वरूप अन्न को प्राप्त करने के लिए प्रयत्नशील रहता है। उसीप्रकार
तत्त्वज्ञान के साधन जो श्रवण, मनन, निदिध्यासन आदि हैं, उन्हें छोड़कर
दूसरे सांसारिकविषयों में बार-बार दौड़कर जाते हुए मन को एक विशेष
प्रकार की अन्तःकरण की वृत्ति नियन्त्रित करती है। इसी रोकने वाली वृत्ति
को दर्शन की भाषा में शम कहते हैं। संक्षेप में-अन्तरिन्द्रिय मन को बाह्य
सांसारिकविषयों से हटाकर तत्त्वज्ञान के साधनस्वरूप वेदों के श्रवण, मनन
आदि में लगाना ही शम है। इसप्रकार शम हमारे अन्दर स्थित मन नामक
इन्द्रिय का वह व्यापार है जो उसे सांसारिक भौतिकसुखों की ओर जाने से
रोकता है।