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वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

by सदानन्द योगीन्द्र

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished314 pages

Page 125 of 314

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Page 125

मङ्गलाचरण १११
(ग) अखिलाधारम्-यह ब्रह्म सम्पूर्ण चराचरप्रपञ्च का मूल आधार है।
वह आकाश आदि मूलकारणों का भी कारण है। यदि हम उसका भी कारण
मानें तो फिर उसका भी कारण, इसप्रकार बार-बार सोचने पर अनवस्था
दोष होगा। इसलिए एकमात्र ब्रह्म को ही वेदान्त में सम्पूर्ण चराचर जगत् का
कारण माना गया है तथा उसका कोई कारण नहीं है।
वह सम्पूर्णसृष्टि की रचना करने में पूर्णतया समर्थ है। इसके लिए उसे
किसी अन्य बाह्यसत्ता की आवश्यकता नहीं है। सृष्टिरूपी कार्य के लिए
वही उपादानकारण भी है और निमित्तकारण भी। इस विषय में यहाँ मकड़ी
का उदाहरण प्रस्तुत किया गया है, क्योंकि वह अपने जाले के निर्माण में
उपादान और निमित्तकारण दोनों होती है। जिसप्रकार मनुष्य के केश एवं
लोम स्वाभाविकरूप में उत्पन्न होते हैं। उसमें श्वसनप्रक्रिया स्वाभाविकरूप
से होती है। ठीक उसीप्रकार अक्षरब्रह्म से यह सृष्टि उत्पन्न होती है। अतः
एकमात्र वही इस सम्पूर्ण सृष्टि का आधार अर्थात् एकमात्र कारण है।
वही ब्रह्म इस समस्तसृष्टि का सञ्चालक, पालक आदि भी है। इसकी
सृष्टि, स्थिति एवं विनाश उसी की इच्छा पर निर्भर है। इसलिए जब वह
चाहता है तो सम्पूर्णप्रपञ्च को अपने में ही समेटकर अकेला विद्यमान रहता
है।
(घ) अखण्डम्-समस्त श्रुतियाँ ब्रह्म को एकमेवाद्वितीयम् कहकर
वर्णित करती हैं। अद्वैतवेदान्त के अनुसार इस सम्पूर्ण चराचरजगत् में एक ही
यथार्थसत्ता है और वह है ब्रह्म। किसी भी वस्तु के एकत्व अनेकत्व का
निर्णय भेद के आधार पर किया जाता है, जिसे तीन श्रेणियों में विभाजित
कर सकते हैं-स्वगत, सजातिगत तथा विजातीय भेद।
वृक्ष का शाखाओं एवं पत्तों में स्वगतभेद होता है। आम्र और केले के
वृक्षों में सजातीयभेद विद्यमान है, उनकी जाति वृक्षत्व एक होते हुए भी वे
व्यक्तिशः भिन्न हैं तथा वृक्ष का पत्थर से विजातीयभेद होता है। ब्रह्म एक
है, अतः अद्वितीय है वह उपर्युक्त तीनों प्रकार के भेदों से रहित है।
इसीलिए उसे एकमेवाद्वितीयम् कहा गया है। जिसे ग्रन्थकार ने अखण्डम्
विशेषण द्वारा अभिव्यक्त किया है। ब्रह्म की इस विशेषता को उपनिषदों में
इसप्रकार कहा गया है-
ओ३म् पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥