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वराह पुराण

Varaha Purana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished414 pages

२६-दशमी तिथिके माहात्म्यके प्रसङ्गमें दिशाओंकी उत्पत्तिकी कथा

Page 77Permalink
६६संक्षिप्त श्रीवराहपुराण[ अध्याय २५

चारण ब्रह्माजीको आगे करके कैलास पर्वतको चले। वहाँ पशुपति भगवान् शंकरका दर्शनकर अनेक प्रकारके स्तोत्रोंद्वारा सभीने उनकी स्तुति आरम्भ कर दी।

देवता बोले—महेश्वर! हम समस्त देवता आपकी शरणमें आये हैं। भूतभावन! आप त्रिनेत्र, भगवान् शंकर, उमापति, विश्वपति, मरुत्पति और जगत्पति नामसे विख्यात हैं! आपको हमारा प्रणाम है। प्रभो! आप हमारी रक्षा करें। भगवन्! आपके जटापुञ्जके अग्रभागपर बैठे हुए चन्द्रमाकी किरणोंके प्रकाशसे तीनों जगत् स्वच्छ हो रहे हैं! आप ही अच्युत, त्रिशूलपाणि और पुरुषोत्तम कहलाते हैं। दैत्योंद्वारा उत्पन्न भय हमारे ऊपर आ गया है। आप उससे हमारी रक्षा करनेकी कृपा कीजिये। श्रेष्ठ देवताओंमें भी परम श्रेष्ठ प्रभो! आदिदेव, पुरुषोत्तम, हर, भव, महेश, त्रिपुरान्तक, विभु, भगदेवताके नेत्र हरनेवाले, दैत्यरिपु, पुरातन और वृषभध्वज—इस प्रकार आपके अनन्त नाम हैं। भगवन्! हमारी रक्षामें आप ही सक्षम हैं। गिरिजापति प्रभो! पर्वतपत्नी मैनाके आप वात्सल्य-भाजन हैं! देवेश्वर! अच्युत, गणेश, भूतेश, शिव, अक्षय, अयन और दैत्यवरान्तक आपकी संज्ञाएँ हैं। भगवन्! आप हमारी रक्षा करें। पृथ्वी आदि पाँच तत्त्वोंमें आप प्रतिष्ठित हैं। आपके प्रधान गुण भी पाँच हैं। विशेषता यह है कि आप आकाशमें तो केवल ध्वनिरूपसे लीन रहते हैं, अग्निमें शब्द एवं रूप—इन दो गुणोंसे, वायुमें तीन रूपोंसे, जलमें शब्द, स्पर्श, रूप, रस—इन चार रूपोंसे और पृथ्वीमें गन्धसहित पाँच रूपोंसे विराजते हैं। भगवन्! अग्नि आपका स्वरूप है। वृक्ष, पत्थर और तिल आदिमें आप साररूपसे स्थित हैं। भगवन्! आप महान् शक्तिशाली पुरुष हैं। इस समय दैत्योंद्वारा हमें अत्यन्त दुःख भोगना पड़ रहा है। अतः आप हमारी रक्षा करें। त्रिलोचन! जिस समय यह सारा विश्व सृष्टिशून्य था तथा ये सूर्य, चन्द्रमा, इन्द्र आदि भी नहीं थे, उस समय त्रिनेत्र! सभी प्रमाणोंसे परे, समस्त बाधाओंसे वर्जित केवल आपकी ही सत्ता विराजित थी। भगवन्! आप कपालकी माला पहनते हैं। द्वितीयाके चन्द्रमा आपके मस्तककी शोभा बढ़ाते हैं। श्मशानभूमिमें आप निवास करते हैं। भस्मसे आपकी अनुपम शोभा होती है। आप शेषनागका यज्ञोपवीत पहनते हैं। देवेश्वर! मृत्युञ्जय! आप अपनी तीव्र बुद्धिके सहारे हमारी रक्षा करें। भगवन्! आप पुरुष हैं और ये श्रीगिरिजा अर्द्ध-देहरूपमें आपकी शक्ति हैं। आपमें ही यह जगत् स्थित है। आहवनीय आदि अग्नियोंने आपके तीनों नेत्रोंमें स्थान पाया है। समस्त सागर तथा पर्वतोंसे निकलकर समुद्रतक जानेवाली नदियाँ आपकी जटाएँ हैं। आप विशुद्ध ज्ञानघन हैं। जिनकी दृष्टि दूषित है, वे ही आपको भौतिकरूपमें देखते हैं। जगत्के उत्पत्तिकर्ता भगवान् नारायण तथा चार मुखोंसे शोभा पानेवाले ब्रह्मा भी आप ही हैं। सत्त्व आदि तीनों गुणों, आहवनीय, आवसथ्य आदि तीनों अग्नियों तथा कृत-त्रेता आदि युगोंके भेदसे आप त्रिमूर्ति बन जाते हैं। प्रभो! ये प्रधान देवता आपकी सहायता चाहते हैं। ये आपको अपना तोषक एवं रक्षक कहते हैं। क्योंकि रुद्र! विश्वका भरण-पोषण करना आपका स्वभाव है। अतः भस्मको भूषणरूपमें धारण करनेवाले प्रभो! आप हमारी रक्षा करें।

मुनिवर महातपा कहते हैं—राजन्! देवताओंके इस प्रकार स्तुति करनेपर पशुपति भगवान् शंकर स्थिर होकर बोले—‘देवताओ! आपका क्या कार्य है? शीघ्र बतलाएँ।’

देवगण बोले—देवेश! दानवोंके वधके लिये