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वराह पुराण

वराह पुराण

Varaha Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished414 pages

Page 96 of 414

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Page 96

अध्याय ३७ ] आरुणि और व्याधका प्रसङ्ग ८५

रहे थे तो उन्होंने सामनेसे आते हुए एक भयंकर व्याधको देखा, जो हाथमें बड़ा-सा धनुष लिये हुए था। उसकी आँखें बड़ी क्रूर थीं। वह उन ब्राह्मणके वल्कल वस्त्र छीनने और उन्हें मारनेके विचारसे आया था। उस ब्रह्मघातीको देखकर आरुणिके मनमें घबड़ाहट उत्पन्न हो गयी और वे भयसे थरथर काँपने लगे। किंतु ब्राह्मणके अन्तःशरीरमें भगवान् नारायणको देखकर वह व्याध डर-सा गया। उसने उसी क्षण धनुष और बाण हाथसे गिरा दिये और कहा।

व्याधने कहा—ब्रह्मन्! मैं आपको मारनेके विचारसे ही यहाँ आया था; किंतु आपको देखते ही पता नहीं मेरी वह क्रूर-बुद्धि अब कहाँ चली गयी। विप्रवर! मेरा जीवन सदा पाप करनेमें ही बीता है। अबतक मेरे द्वारा हजारों ब्राह्मण मृत्युके मुखमें प्रविष्ट हो गये। प्रायः दस हजार साध्वी स्त्रियोंका भी मैंने अन्त कर डाला है। अहो, ब्राह्मणकी हत्या करनेवाला मैं पापी पता नहीं, किस गतिको प्राप्त करूँगा? महाभाग! अब आपके पास रहकर मैं भी तप करना चाहता हूँ। आप कृपया उपदेश देकर मेरा उद्धार करें।

व्याधके इस प्रकार कहनेपर उसे ब्रह्मघाती एवं महान् पापी समझकर द्विजश्रेष्ठ आरुणिने उसे कोई उत्तर नहीं दिया; परंतु हृदयमें धर्मकी अभिलाषा जग जानेके कारण ब्राह्मणके कुछ न कहनेपर भी वह व्याध वहीं ठहर गया। ब्राह्मण भी नदीमें स्नानकर वृक्षके नीचे बैठे हुए तप करते रहे। इस प्रकार अब उन दोनोंका नियमित धार्मिक कार्यक्रम चलने लगा। इसी प्रकार कुछ दिन बीत गये। एक दिनकी बात है—आरुणि स्नान करने नदीके जलमें भीतर गये थे। इधर कोई भूखसे व्याकुल बाघ तबतक उन शान्तस्वरूप मुनिको मारनेके लिये आ पहुँचा। पर इसी बीच व्याधने बाघको मार डाला। मरनेपर उस बाघके शरीरसे एक पुरुष निकला। बात ऐसी थी—जिस समय आरुणि जलमें थे और बाघ उनपर झपटा, उस समय घबड़ाहटके कारण मुनिके मुँहसे सहसा 'ॐ नमो नारायणाय' यह मन्त्र निकल गया। बाघके प्राण तबतक उसके कण्ठमें ही थे और उसने यह मन्त्र सुन लिया। प्राण निकलते समय केवल इस मन्त्रको सुनलेनेसे वह एक दिव्य पुरुषके रूपमें परिणत हो गया। तब उसने कहा—'द्विजवर! जहाँ भगवान् विष्णु विराजमान हैं, मैं वहीं जा रहा हूँ। आपकी कृपासे मेरे सारे पाप धुल गये। अब मैं शुद्ध एवं कृतार्थ हो गया।'

इस प्रकार उस पुरुषके कहनेपर विप्रवर आरुणिने उससे पूछा—'नरश्रेष्ठ! तुम कौन हो?' राजेन्द्र! तब पूर्वजन्ममें जो बात बीती थी, उसे बतलाते हुए वह कहने लगा—'इसके पहले जन्ममें मैं 'दीर्घबाहु' नामसे प्रसिद्ध एक राजा था। समस्त वेद, सम्पूर्ण धर्मशास्त्र मुझे सम्यक् प्रकारसे अभ्यस्त थे। अन्य शास्त्र भी मुझसे अपरिचित नहीं थे। पर अन्य ब्राह्मणोंसे मेरा कोई प्रयोजन न था। मैं प्रायः ब्राह्मणोंका अपमान भी कर देता था। मेरे इस व्यवहारसे सभी ब्राह्मण क्रुद्ध हो गये और उन्होंने मुझे भीषण शाप दे दिया—'तू अत्यन्त निर्दयी बाघ होगा; क्योंकि तेरे द्वारा ब्राह्मणोंका भीषण अनादर हो रहा है। तुझे किसी बातका स्मरण भी न रहेगा। अरे प्रचण्ड मूर्ख! मृत्युके समय भगवान् नारायणका नाम तेरे कानोंमें पड़ेगा।'

विप्रवर! वे सभी ब्राह्मण वेदके पारगामी विद्वान् थे। उनका भीषण शाप मुझे लग गया। मुने! जब ब्राह्मणोंने शाप दिया तो मैं उनके पैरोंपर गिर पड़ा तथा उनसे कृपापूर्वक क्षमाकी भीख माँगी। मुझपर उनकी कृपादृष्टि हो गयी।