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वराह पुराण

वराह पुराण

Varaha Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished414 pages

Page 95 of 414

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Page 95
८४संक्षिप्तश्रीवराहपुराण[ अध्याय ३७

पुरुषकी उपासना करते हैं, उन्हें मुक्तिका पात्र माना जाता है। आपकी न कोई मूर्ति है और न कोई कर्म। आप परम कल्याणमय हैं। आप शङ्ख, चक्र एवं कमल धारण करते हैं—यह पुराणोंका कथन या सारी स्तुति औपचारिकमात्र है। मैं आपको निरन्तर नमस्कार करता हूँ। आप वामनका अवतार धारण करके तीनों लोकोंपर विजय पा चुके हैं। आप कृष्णादि चतुर्व्यूहसे शोभा पाते हैं। शम्भु, विभु, भूतपति और सुरेश—ये सब आपके ही नाम हैं। ऐसे अनन्त एवं विष्णुनामधारी आप प्रभुको मैं प्रणाम करता हूँ। भगवन्! आप स्थावर-जङ्गम अखिल जगत्की सृष्टि, पालन और संहार करते हैं। प्रभो! मैं मुक्ति चाहता हूँ। अतः आप अभी मुझे उस स्थानपर ले चलें, जहाँ गये हुए योगी पुरुष पुनः वापस नहीं आते। विश्वमूर्ते! गोविन्द! आपकी जय हो! सर्वज्ञ, अप्रमेय एवं विश्वेश्वर! आपकी जय हो, जय हो!

भगवान् वराह कहते हैं—वसुंधरे! उस समय राजा प्रजापालने इस प्रकार भगवान् गोविन्दकी स्तुति की और अपने शरीरको उनमें लीन कर दिया और वे शाश्वत धामको पधार गये।

[अध्याय ३६]

आरुणि और व्याधका प्रसङ्ग, नारायण-मन्त्र-श्रवणसे बाघका शापसे उद्धार

**पृथ्वीने पूछा—**भगवन्! आप सम्पूर्ण प्राणियोंका सृजन करते हैं। प्रभो! मैं आपकी उपासनाकी विधि जानना चाहती हूँ—अर्थात् श्रद्धालु स्त्रियाँ अथवा पुरुष आपकी उपासना किस प्रकार करते हैं? विभो! आप मुझे यह सब बतानेकी कृपा कीजिये।

**भगवान् वराह कहते हैं—**देवि! मैं भावसे ही वशीभूत होता हूँ। मैं न तो प्रचुर धनोंसे सुलभ हूँ और न जपादि अन्य उपासनासे ही। साथ ही भक्त लोग मुझे तपद्वारा भी प्राप्त करते हैं—एतदर्थ मैं तुमसे कुछ साधनोंका निर्देश करता हूँ। जो मनुष्य मन, वाणी और कर्मसे मुझमें अपना चित्त लगाये रहता है, उसके लिये अनेक प्रकारके (तपोरूप) व्रत हैं। उन्हें मैं बताता हूँ, सुनो। अहिंसा, सत्यभाषण, चोरी न करना और ब्रह्मचर्यका पालन करना—ये मानसिक व्रत कहे जाते हैं।^१ दिनमें एक समय भोजन करना अथवा केवल एक बार रातमें भोजन करना पुरुषोंके लिये शारीरक व्रत (या तप) हैं। इसमें कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये। वेद पढ़ना, भगवान् विष्णुके नाम-यशका कीर्तन करना, सत्य बोलना, किसीकी चुगली न करना, हितकारी मधुर बात कहना, सबका हित सोचना, धर्मपर आस्था रखना और धर्मयुक्त बातें बोलना—ये वाणीके उत्तम व्रत हैं।

वसुंधरे! इस विषयमें एक प्रसङ्ग सुना जाता है—पूर्वकल्पमें आरुणि नामसे विख्यात एक महान् तपस्वी ब्राह्मण-पुत्र थे। वे ब्राह्मणश्रेष्ठ किसी उद्देश्यसे तप करनेके लिये वनमें गये और वहाँ वे उपवासपूर्वक तपस्या करने लगे। उन ब्राह्मणने देविका नदी^२के सुन्दर तटपर अपने रहनेका आश्रम बनाया था। एक बार किसी दिन वे ब्राह्मण देवता स्नान-पूजा करनेके विचारसे उस नदीके तटपर गये। स्नान करके वे जब जप कर


१. तुलनीय गीता १७।१४
२. इस नामकी कई नदियाँ हैं, पर यहाँ यह पंजाबकी देग नदी है; 'महाभारत' तथा 'स्कन्दपुराण'में इसका बहुधा उल्लेख है।