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वराह पुराण

वराह पुराण

Varaha Purana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished414 pages

Page 233 of 414

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Page 233
२२२संक्षिप्त श्रीवराहपुराण[ अध्याय १२७

न्यायके अनुसार हो अथवा जिससे उसकी हार्दिक तुष्टि हो। जिसके मनमें गुरुके प्रति पवित्र भक्ति-भावना हो तथा जिस दीक्षाकी विशेष अभिलाषा हो, वह भगवान् विष्णुके मन्दिरमें जाकर नियमका पालन करते हुए सभी कार्योंको सम्पन्न करे। फिर आचार्य पूर्वाभिमुख बैठकर दीक्षाकी इच्छा रखनेवाले सभी शिष्योंको निम्नलिखित उपदेश सुनाये।

जो व्यक्ति मेरा भक्त होकर भी किन्हीं अन्य भगवद्भक्त सत्पुरुषोंको देखकर उनके लिये आदरपूर्वक उठकर स्वागत-सत्कार आदि कर्म नहीं करता, वह मानो मेरी ही हिंसा करता है। जो कन्याका दान करके अपने कर्मसे उसका उपकार नहीं करता, उसने मानो अपने पूर्वके आठ पितरोंकी हत्या कर दी। जो निष्ठुर व्यक्ति अपनी साध्वी स्त्रीका भी, जो एक प्रिय मित्रका कार्य करती है, वध करता है—वह हिंसक व्यक्ति पुनः स्त्री-योनिमें जन्म पाता है और पूर्वोक्त कर्मके प्रभावसे उसे पुनः दाम्पत्यसुखकी प्राप्ति नहीं होती। ब्राह्मणका वध करनेवाला, कृतघ्न, गोघाती—ये पापी समझे जाते हैं तथा जो अन्य पापी कहे गये हैं, वे यदि शिष्य बनकर दीक्षा लेना चाहें तो उन्हें शिष्य न बनाकर उनका परित्याग ही कर देना चाहिये।

दीक्षित पुरुषको चाहिये कि वह यदि परमसिद्धि या मोक्ष पानेकी इच्छा रखता हो या सनातन धर्मका संग्रह करना चाहता हो तो बेल, गूलर तथा उपयोगी वृक्षोंको कभी न काटे। क्या खाना चाहिये, क्या नहीं खाना चाहिये, इसे आचार्यको भी अपने शिष्यको बता देना चाहिये। गूलरका ताजा फल भक्ष्य है, पर उसका बासी फल सर्वथा अभक्ष्य है। लहसुन, प्याज आदि वस्तुएँ जिनसे दुर्गन्ध निकलती हैं, वे सभी अभक्ष्य मानी जाती हैं।

दीक्षित व्यक्तिके लिये उचित है कि वह सभी प्रकारके मांस-मछलियोंका निश्चयपूर्वक सर्वथा त्याग कर दे। उसे दूसरोंकी निन्दा और प्राणीकी हिंसा भी कभी नहीं करनी चाहिये। वह किसीकी चुगली न करे और चोरी तो सर्वथा त्याग दे। दूरसे आये हुए अतिथिको आदर-सत्कारपूर्वक भोजनादि कराना चाहिये। वह गुरु, राजा तथा ब्राह्मणकी स्त्रीके प्रति मनमें कभी बुरी भावना न करे। सुवर्ण, रत्न और युवती स्त्री—इनकी ओर चित्त न लगाये। दूसरेके उत्तम भाग्य और अपनी विपत्तिको देखकर दुःख न करे, यह सनातन धर्म है।

वसुंधरे! दीक्षाके पहले मन्त्र लेनेवाले शिष्यके प्रति गुरु इन सब बातोंका उपदेश दें। सुन्दरि! साथ ही छुरा तथा जलसे भरा हुआ एक पात्र भी रखना चाहिये, फिर मन्त्रोच्चारणपूर्वक मेरा आवाहन एवं विधिके साथ मेरा पूजन करना चाहिये।

देवि! इस प्रकार अर्घ्य एवं पाद्य देनेके उपरान्त गुरु हाथमें अस्तूरा लेकर शुद्ध भावसे यह मन्त्र पढ़े। मन्त्रका भाव यह है—'शिष्य! विष्णुमय जलकी सहायतासे तुम्हारा क्षौरकर्म किया जा रहा है। इस अवसरपर वरुण देवता तुम्हारे सिरकी रक्षा करें। यह दीक्षा संसारसे उद्धार करनेवाली है।' फिर नाई क्षौरकर्म करे और यजमान उस कलशको उस नाईको ही दे दे। नाई ऐसी सावधानीसे (सिरका) क्षौरकर्म करे कि कहीं त्वचाके कटनेसे एक विन्दु भी रक्त न निकले। इस प्रकार सविधि कृत्य सम्पन्न कर लेना चाहिये। इसके उपरान्त यजमान भगवान्‌में श्रद्धा रखनेवाले पुरुषोंको प्रणाम करके अग्नि प्रज्वलित करे और फिर वह धानका लावा, काला तिल, घृत और मधु—इन वस्तुओंको मिलाकर उसमें सात आहुतियाँ प्रदान करे। फिर तिल और खीरसे बीस आहुतियाँ देनी