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वराह पुराण

वराह पुराण

Varaha Purana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished414 pages

Page 232 of 414

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Page 232

अध्याय १२७] 'दीक्षासूत्र' का वर्णन २२१

'दीक्षासूत्र' का* वर्णन

सूतजी कहते हैं—इस प्रकार अनेक धर्मोंको सुनकर बहुतोंको मुक्ति सुलभ हो जाय, इस उद्देश्यसे पृथ्वीने भगवान् जनार्दनसे पूछा— भगवन् ! 'मायातीर्थ'की महिमा बड़ी अद्भुत है। इसके माहात्म्य-श्रवणसे मेरा अन्तःकरण शुद्ध हो गया। अब प्राणियोंके कल्याण तथा विश्वकी रक्षाके लिये आप कृपाकर मुझे अपनी दीक्षाविधिका उपदेश करें।

भगवान् वराह बोले—देवि! तुमने जो भागवती दीक्षाके विषयमें पूछा है, अब उसे बताता हूँ, सुनो। यह दीक्षा कर्ममय संसारसे मुक्त और सर्वसुख प्रदान करनेवाली है। इस दीक्षाका रहस्य योगव्रतमें स्थित रहनेवाले देवतातक भी नहीं जानते। इस मङ्गलमय धर्मका रहस्य केवल मैं ही जानता हूँ। देवि! उत्तम दीक्षा वह है, जिसके प्रभावसे मुझमें मन लगाकर मनुष्य सुखपूर्वक गर्भवासरूप संसार-समुद्रसे पार पा जाता है। इसके लिये साधकको चाहिये कि वह गुरुके समीप जाकर उनसे प्रार्थना करे कि 'गुरुदेव! मैं आपका शिष्य होना चाहता हूँ, आप मुझे दीक्षा देनेकी कृपा कीजिये।' फिर उनकी आज्ञासे दीक्षाके उपयोगी पदार्थों—धानका लावा, मधु, कुश, घृत, चन्दन, पुष्प, दीप-धूप-नैवेद्य, काला मृगचर्म, पलाशका दण्ड, कमण्डलु, कलश, वस्त्र, खड़ाऊँ, स्वच्छ यज्ञोपवीत, अर्घ्यपात्र, चरुस्थाली, दर्वी, तिल-यव, अनेक प्रकारके फल, दीक्षित पुरुषोंके खानेयोग्य अन्न, तथा पीनेयोग्य तीर्थोंके जल आदि वस्तुओंको लाकर एकत्र करे। साथ ही आवश्यक (उपयोगी) विविध प्रकारके बीज, रत्न, एवं काच आदि पदार्थोंको भी एकत्र कर ले।

तदनन्तर माङ्गलिक द्रव्य लगाकर स्नान करे और गुरुके चरणोंको पकड़कर उनसे आज्ञा लेकर एक बड़ी वेदीका निर्माण करे। यदि दीक्षा लेनेवाला व्यक्ति ब्राह्मण हो तो उसे चाहिये कि वह सोलह हाथ लम्बी-चौड़ी चौकोर वेदी बनाकर उसके ऊपर कलशकी स्थापना करे। धान्यके ऊपर नवीन एवं सुदृढ़ कलशकी विधिपूर्वक स्थापना कर वेदमन्त्रोंका उच्चारण करके उसमें जल भर दे और फिर पुष्पों तथा पल्लवोंसे उसे अलंकृत कर दे। तत्पश्चात् उसपर विधिपूर्वक तिलोंसे भरा हुआ एक पात्र स्थापित कर गुरुमें मेरी भावना करके पहलेसे एकत्र किये हुए द्रव्योंके द्वारा उनकी विधिपूर्वक पूजा करे। गुरुके प्रति निश्चितरूपसे धर्मको जानने तथा पालन करनेवाला शिष्य पुरुष उनकी सविधि पूजाकर पूर्वोक्त निर्दिष्ट द्रव्योंको उस वेदीपर स्थापित करे। सुन्दरि! फिर चारों भागोंमें जलसे भरे हुए चार कलशोंको आमके पल्लवोंसे पूर्णकर ब्राह्मणोंको दानार्थ संकल्प कर दे। इसके बाद वेदीको श्वेत सूतोंद्वारा सब ओरसे घेर दे और चारों पार्श्वभागोंमें चार पूर्णपात्र रखे। उस समय दीक्षा देनेवाले गुरुका कर्तव्य है कि उक्त कार्य सम्पन्न करके शिष्यको ऐसा मन्त्र दे, जो रुचि एवं वर्णादिके


* दीक्षाका परम श्रेष्ठ वर्णन 'कुलार्णवतन्त्र' उल्लास १४, 'शारदातिलक' पटल ४-५, 'शिवपुराण' वायवीयसंहिता, नारदपुराण अ० ९० तथा अग्निपुराण अध्याय ८१ से ९० में भी आया है। 'कल्याण' के अग्निपुराणाङ्क पृष्ठ १४३ से १५६ तककी टिप्पणियाँ पर्याप्त उपयोगी हैं।