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वराह पुराण

वराह पुराण

Varaha Purana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished414 pages

Page 226 of 414

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Page 226

अध्याय १२६ ] कुब्जाम्रकतीर्थ (हृषीकेश)-का माहात्म्य, रैभ्यमुनिपर भगवत्कृपा २१५

प्रकारका क्लेश नहीं होता। अब मैं (ऋषिकेश)-
में ही स्थित एक दूसरे तीर्थकी बात बतलाता हूँ।
वह 'करवीर' नामसे प्रसिद्ध है एवं सम्पूर्ण
लोकोंको सुखी करनेवाला है। शुभे! अब उसका
चिह्न भी बतलाता हूँ, जिसकी सहायतासे ज्ञानी
पुरुष इसे पहचान सकें। सुन्दरि! माघ मासके
शुक्ल पक्षकी द्वादशी तिथिके दिन मध्याह्न
कालके समय इस 'करवीर' तीर्थमें कनेरके फूल
खिल जाते हैं—यह निश्चय है। उस तीर्थमें स्नान
करनेवाला मनुष्य स्वतन्त्रतापूर्वक सर्वत्र अव्याहत-
गमन करनेमें पूर्ण समर्थ हो जाता है। यदि माघ
मासकी द्वादशी तिथिके दिन उस क्षेत्रमें किसीकी
मृत्यु हो जाती है तो उसे ब्रह्मा, रुद्र और मेरे
दर्शनका सौभाग्य प्राप्त होता है। वसुंधरे! अब
एक दूसरे तीर्थका प्रसङ्ग सुनो। भद्रे! उस
'कुब्जाम्रकक्षेत्र' का यह स्थान मुझे बहुत प्रिय है।
इस स्थानका नाम 'पुण्डरीकतीर्थ' है, जो महान्
फल देनेकी शक्तिवाला है। सुमुखि! उस तीर्थका
विशेष चिह्न बतलाता हूँ, सुनो—'सुन्दरि! द्वादशी
तिथिके दिन मध्याह्नकालमें वहाँ रथके चक्केकी
आकृतिवाला एक कछुआ विचरण करता है।'
वसुमति! अब तुमसे इसके विषयमें एक दूसरी
बात बताता हूँ, उसे सुनो—'सुन्दरि! वहाँ
अवगाहन करनेपर 'पुण्डरीकयज्ञ' के अनुष्ठानका
फल मिलता है। यदि वहाँ किसीकी मृत्यु होती
है तो उसे दस 'पुण्डरीक' यज्ञोंके अनुष्ठानका
फल प्राप्त होता है।'

अब मैं 'कुब्जाम्रक' (ऋषिकेश)-में स्थित
एक दूसरे—'अग्नितीर्थ' की बात बतलाता हूँ,
उसे सुनो—'देवि! द्वादशी तिथिके दिन पुण्यात्मा
लोगोंको ही इस तीर्थकी स्थिति ज्ञात होती है।
कार्तिक, अगहन, आषाढ़ एवं वैशाख मासके
शुक्ल पक्षकी द्वादशीके दिन जो पुरुष उस तीर्थमें
यत्नपूर्वक निवास करता है, वह उस तीर्थका
रहस्य जान सकता है।' वसुंधरे! उस तीर्थका
चिह्न यह है कि हेमन्त ऋतुमें तो वहाँका जल
उष्ण रहता है, पर ग्रीष्म ऋतुमें वह शीतल हो
जाता है। महाभागे! इसी विचित्रताके कारण इस
स्थानका नाम 'अग्नितीर्थ' पड़ गया है।

देवि! अब एक दूसरे तीर्थका परिचय देता हूँ,
उसका नाम 'वायव्य-तीर्थ' है। उस तीर्थमें जो
स्नान करके तर्पण आदि कार्य करता है, उसे
वाजपेय-यज्ञका फल प्राप्त होता है। यह वायव्यतीर्थ
एक 'सरोवर'के रूपमें है। वहाँ केवल पंद्रह
दिनोंतक रहकर मेरी उपासना करते हुए जिसकी
मृत्यु हो जाती है, उसका इस पृथ्वीपर पुनः जन्म
या मरण नहीं होता। वह चार भुजाओंसे युक्त
होकर मेरा सारूप्य प्राप्तकर मेरे लोकमें प्रतिष्ठा
प्राप्त करता है। उस 'वायव्य' तीर्थकी पहचान यह
है कि वहाँ वनमें पीपलके ऐसे वृक्ष हैं, जिनके पत्ते
चौबीसों द्वादशियोंको निरन्तर हिलते ही रहते हैं।

पृथ्वि! अब 'कुब्जाम्रक' तीर्थके अन्तर्वर्ती
'शक्रतीर्थ' का परिचय देता हूँ। वसुंधरे! वहाँ इन्द्र
हाथमें वज्र लिये हुए सुशोभित रहते हैं। महातपे!
उस तीर्थमें दस रात्रि उपवास रहकर जो मनुष्य
मर जाता है, वह मेरे लोकको प्राप्त कर लेता
है। इस शक्रतीर्थके दक्षिण भागमें पाँच वृक्ष खड़े
हैं, यही उसकी पहचान है। देवि! वरुणदेवने
बारह हजार वर्षोंतक इस 'कुब्जाम्रक'-तीर्थमें
तपस्या की थी। अतः यहाँ स्नान करनेसे व्यक्ति
आठ हजार वर्षोंतक वरुणलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त
करता है। वहाँ ऊपरसे पानीकी एक धारा निरन्तर
गिरती रहती है, यही उस तीर्थकी पहचान है।

पृथ्वि! उक्त 'कुब्जाम्रक'-तीर्थ (ऋषिकेश)-
में 'सप्तसामुद्रक' नामका भी एक श्रेष्ठ स्थान है।
उस तीर्थमें स्नान करनेवाला धर्मात्मा मनुष्य तीन