वराह पुराण
Varaha Purana
by महर्षि वेदव्यास
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Read in context| २१४ | संक्षिप्तश्रीवराहपुराण | [ अध्याय १२६ |
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आप मुझपर प्रसन्न हैं तो मैं यह चाहता हूँ कि जबतक यह संसार रहे तथा अन्य लोक रहें, तबतक आपका यहाँ निवास हो और जनार्दन जबतक आप यहाँ स्थित रहें, तबतक आपमें मेरी निष्ठा बनी रहे। प्रभो! यदि आप मुझपर संतुष्ट हैं तो मेरा यह मनोरथ पूर्ण करनेकी कृपा कीजिये।'
वसुंधरे! उस समय ऋषिवर रैभ्यकी बात सुनकर पुनः मैंने कहा—'ब्रह्मर्षे! बहुत ठीक। ऐसा ही होगा।' फिर उन ब्राह्मणने बड़े हर्षके साथ मुझसे कहा—'प्रभो! आप इस प्रधान तीर्थकी महिमा भी बतलानेकी कृपा करें और मैं उसे सुनूँ। यही नहीं, इस क्षेत्रमें अन्य भी जितने क्षेत्र हैं, उनका भी आप माहात्म्य बतलायें।' देवि! तब मैंने कहा—'ब्रह्मन्! तुम मुझसे जो पूछ रहे हो, वह विषय तत्त्वपूर्वक सुनो। मेरा 'कुब्जाम्रक' तीर्थ परम पवित्र स्थान है। इसका सेवन करनेसे सभी सुख सुलभ हो जाते हैं। यह 'कुब्जाम्रक' तीर्थ कुमुदपुष्पकी आकृतिमें स्थित है। यहाँ केवल स्नान करनेसे मानव स्वर्ग प्राप्त कर लेता है। कार्तिक, अगहन एवं वैशाख मासके शुभ अवसरपर जो पुरुष यहाँ दुष्कर धर्मोंका अनुष्ठान करता है, वह स्त्री, पुरुष अथवा नपुंसक ही क्यों न हो—अपने प्राणोंका त्याग कर मेरे लोकको प्राप्त होता है।'
वसुंधरे! 'कुब्जाम्रक'तीर्थमें जो दूसरा तीर्थ है, उसे भी बतलाता हूँ, सुनो। सुन्दरि! यहाँ 'मानस' नामसे मेरा एक प्रसिद्ध तीर्थ है। सुनयने! वहाँ स्नान कर मनुष्य इन्द्रके नन्दनवनमें जाता है और अप्सराओंके साथ देवताओंके वर्षसे एक हजार वर्षोंतक वह आनन्दका उपभोग करता रहता है।
वसुंधरे! अब यहाँके एक दूसरे तीर्थका वर्णन करता हूँ सुनो—वह स्थान 'मायातीर्थ'के नामसे विख्यात है, जिसके प्रभावसे मायाकी जानकारी प्राप्त हो जाती है। उस तीर्थमें स्नान करनेवाला पुरुष दस हजार वर्षोंतक मेरी भक्तिमें रत रहता है। यशस्विनि! 'मायातीर्थ'में जो प्राण छोड़ता है, महान् योगियोंके समान वह मेरे लोकको प्राप्त होता है।
देवी पृथ्वि! अब यहाँका एक दूसरा तीर्थ बतलाता हूँ—उस तीर्थका नाम 'सर्वकामिक' है। वैशाख मासकी द्वादशी तिथिके दिन जो कोई वहाँ स्नान करता है, वह पंद्रह हजार वर्षोंतक स्वर्गमें निवास करता है। यदि इस 'सर्वकामिक' तीर्थमें वह प्राण त्याग करता है तो सभी आसक्तियोंसे मुक्त होकर मेरे लोकको प्राप्त होता है।
सुलोचने! अब एक 'पूर्णमुख' नामक तीर्थकी महिमा बतलाता हूँ, जिसे कोई नहीं जानता। गङ्गाका जल इधर प्रायः सर्वत्र शीतल रहता है, किंतु यहाँ जिस स्थानपर गङ्गामें गर्म जल मिले, उसे ही 'पूर्णतीर्थ' समझना चाहिये। देवि! वहाँ स्नान करनेवाला मनुष्य चन्द्रलोकमें प्रतिष्ठा पाता है और पंद्रह हजार वर्षोंतक उसे चन्द्र-दर्शनका आनन्द मिलता है। फिर जब वह स्वर्गसे नीचे गिरता है तो ब्राह्मणके घर उत्पन्न होता है और मेरा पवित्र भक्त, कार्य-कुशल और सम्पूर्ण धर्म एवं गुणोंसे सम्पन्न होता है और अगहन महीनेके शुक्लपक्षकी द्वादशी तिथिके दिन प्राण त्यागकर वह मेरे लोकमें पहुँचता है, जहाँ वह सदा मुझे चतुर्भुजरूपमें प्रकाशित देखता है तथा पुनः कभी जन्म और मृत्युके चक्करमें नहीं पड़ता।
वसुंधरे! मैं अब पुनः एक दूसरे तीर्थका वर्णन करता हूँ। यहाँ वैशाख मासके शुक्लपक्षकी द्वादशीके दिन तप तथा धर्मके अनुष्ठानके पश्चात् अपने शरीरका त्याग करनेवाला पुरुष मेरे लोकको प्राप्त करता है, जहाँ जन्म-मृत्यु, ग्लानि, आसक्ति, भय तथा अज्ञानजनित अभिनिवेशादिसे उसे किसी