वराह पुराण
Varaha Purana
by महर्षि वेदव्यास
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Read in context| १२४ | संक्षिप्तश्रीवराहपुराण | [ अध्याय ७० |
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धारण कर लिये हैं। जब उनमें सर्वाधिक रजोगुण तथा स्वल्प सत्त्वगुण एवं तमोगुणका समावेश हुआ, तब वे ब्रह्मा नामसे प्रसिद्ध हुए। भगवान् नारायणने अपने नाभिकमलसे इन ब्रह्माकी सृष्टि की है। मुझे भी बनानेवाले वे परम प्रभु नारायण ही हैं। अतः भगवान् श्रीहरि ही सर्व-प्रधान हैं।
जिनमें सत्त्वगुण और रजोगुणका आधिक्य हुआ और जिन्हें कमलका आसन मिल गया, वे ब्रह्मा कहलाये। जो ब्रह्मा एवं चतुर्मुख कहलाते हैं, वे भी भगवान् नारायण ही हैं। जो स्वल्प सत्त्व एवं रजोगुण और किंचित् अधिक तमोगुणसे युक्त हैं, वह मैं रुद्र हूँ—इसमें कोई संदेहकी बात नहीं है। सत्त्व, रज और तम—ये तीन प्रकारके गुण कहे जाते हैं। सत्त्वगुणके प्रभावसे प्राणीको मुक्ति सुलभ हो जाती है; क्योंकि सत्त्वगुण भगवान् नारायणका स्वरूप है। जब रज और सत्त्वका सम्मिश्रण होता है और रजोगुणकी कुछ अधिकता होती है, तब सृष्टिका कार्य आरम्भ होता है। यह ब्रह्माजीका स्वाभाविक गुण है। यह बात सम्पूर्ण शास्त्रोंमें पढ़ी जाती है। जिसका वेदोंमें उल्लेख नहीं है, वह रौद्रकर्म मनुष्योंके लिये कदापि हितकर नहीं है। उससे लोक तथा परलोकमें भी मनुष्योंकी दुर्गति ही होती है।
सत्त्वका पालन करनेसे प्राणी जन्म-मरणके बन्धनसे मुक्त हो जाता है। कारण, सत्त्व भगवान् नारायणका स्वरूप है। वे ही प्रभु यज्ञका स्वरूप धारण कर लेते हैं। सत्ययुगमें भगवान् नारायण शुद्ध (ध्यानादिद्वारा) सूक्ष्मरूपसे सुपूजित होते हैं। त्रेतायुगमें वे यज्ञरूपसे तथा द्वापरयुगमें 'पञ्चरात्र'विधिसे की गयी पूजा स्वीकार करते हैं और कलियुगमें तमोगुणी मानव मेरे बनाये हुए अनेक रूपवाले मार्गोंसे मनमें ईर्ष्यासहित उन परमात्मा श्रीहरिकी उपासना करते हैं।
मुनिवर! उन भगवान् नारायणसे बढ़कर अन्य कोई देवता इस समय न है, न अन्य किसी कालमें होगा। जो विष्णु हैं, वही स्वयं ब्रह्मा हैं और जो ब्रह्मा हैं, वही मैं महेश्वर हूँ। तीनों वेदों, यज्ञों और पण्डितसमाजमें यही बात निर्णीत है। द्विजवर! हम तीनोंमें जो भेदकी कल्पना करता है, वह पापी एवं दुरात्मा है; उसकी दुर्गति होती है। अगस्त्य! इस विषयमें एक प्राचीन वृत्तान्त कहता हूँ, तुम उसे सुनो। कल्पके आरम्भमें लोग भगवान् श्रीहरिकी भक्तिसे विमुख रहे। फिर उन सबका भूलोकमें वास हुआ। वहाँ उन्होंने भगवान् विष्णुकी आराधना की। फलस्वरूप उन्हें भुवर्लोकका वास सुलभ हो गया। फिर उस लोकमें रहकर वे भगवान् केशवकी उपासनामें तत्पर हो गये। इससे उन्हें स्वर्गमें स्थान मिल गया। यों क्रमशः संसारसे मुक्त होकर वे परमधाममें पहुँच गये।
द्विजवर! इस प्रकार जब सभी विरक्त एवं मुक्त होने लगे तो देवताओंने भगवान्का ध्यान किया। सर्वव्यापी होनेके कारण वे प्रभु वहाँ तुरंत ही प्रकट हो गये और बोले—'देवताओ! आप सभी श्रेष्ठ योगी हैं। कहें, मेरे योग्य आपलोगोंका कौन-सा कार्य सामने आ गया?' तब उन देवताओंने परम प्रभु देवेश्वर श्रीहरिको प्रणाम किया और कहा—'भगवन्! आप हमलोगोंके आराध्यदेव हैं। इस समय सभी मानव मुक्ति-पदपर आरूढ़ हो गये हैं। अतः अब सृष्टिका क्रम सुचारुरूपसे कैसे चलेगा? नरकोंमें किसका वास हो?'
देवताओंके ऐसा पूछनेपर भगवान्ने उनसे कहा—'देवताओ! सत्ययुग, त्रेता और द्वापर—इन तीन युगोंमें तो बहुत मनुष्य मुझे प्राप्त कर लेंगे। पर कलियुगमें विरले लोग ही मुझे प्राप्त कर सकेंगे; कारण, वेदोंको छोड़कर या वेदविरोधी