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वराह पुराण

वराह पुराण

Varaha Purana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished414 pages

Page 115 of 414

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Page 115
१०४संक्षिप्तश्रीवराहपुराण[ अध्याय ४९

राजा भद्राश्व तो रानी कान्तिमतीके प्रसन्न मुखको प्रतिक्षण देखता ही रहता था। ऐसी परम सुन्दरी रानीको देखनेके कुछ समय बाद अगस्त्यजी आनन्दमें विह्वल होकर बोले—‘राजन्! आप धन्य हैं, धन्य हैं।’ इसी प्रकार दूसरे दिन रानीको देखकर अगस्त्य मुनिने कहा—‘अरे! यह तो सारा विश्व वञ्चित रह गया।’ फिर तीसरे दिन उस रानीको देखकर यों कहने लगे—‘अहो! ये मूर्ख गोविन्द भगवान्‌को भी नहीं जानते, जिन्होंने केवल एक दिनकी प्रसन्नतासे इस राजाको सब कुछ प्रदान किया था।’ चौथे दिन अगस्त्य मुनिने अपने दोनों हाथोंको ऊपर उठाकर फिर कहा—‘जगत्प्रभो! आपको साधुवाद—धन्यवाद है, स्त्रियाँ धन्य हैं। ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य! तुम्हें पुनः-पुनः धन्यवाद है। भद्राश्व! तुम्हें धन्यवाद है। हे अगस्त्य! तुम भी धन्य हो। प्रह्लाद एवं महाव्रती ध्रुव! तुम सभी धन्य हो।’

इस प्रकार उच्च स्वरसे कहकर अगस्त्य मुनि राजा भद्राश्वके सामने नाचने लगे। फिर तो ऐसे कार्यमें संलग्न अगस्त्य मुनिको देखकर रानीसहित उस नरेशने मुनिसे पूछा—‘ब्रह्मन्! आपके इस हर्षका क्या कारण है? आप क्यों इस प्रकार नृत्य कर रहे हैं?’

मुनिवर अगस्त्यने कहा— राजन्! बड़े आश्चर्यकी बात है। तुम कितने अज्ञानी हो; साथ ही तुम्हारा अनुगमन करनेवाले ये मन्त्री, पुरोहित और अन्य अनुजीवी भी मूर्ख ही हैं, जो मेरी बात समझ नहीं पाते।

इस प्रकार अगस्त्य मुनिके कहनेपर राजा भद्राश्वने हाथ जोड़कर कहा—‘ब्रह्मन्! आपके मुखसे उच्चरित पहेलीको हम नहीं समझ पा रहे हैं। अतः महाभाग! यदि आप अनुग्रह करना चाहते हों तो मुझे बतानेकी कृपा करें।’

अगस्त्यजी बोले— राजन्! पूर्वजन्ममें यह रानी किसी नगरमें हरिदत्त नामक एक वैश्यके घरमें दासीका काम करती थी। उस समय भी तुम्हीं इसके पति थे। हरिदत्तके ही यहाँ तुम भी सेवावृत्तिसे एक कर्मचारीका काम करते थे। एक समयकी बात है, आश्विनमासके शुक्लपक्षकी द्वादशीका व्रत नियमपूर्वक करनेके लिये वह वैश्य तत्पर हुआ। स्वयं भगवान् विष्णुके मन्दिरमें जाकर पुष्प एवं धूप आदिसे उन प्रभुकी पूजा की। तुम दोनों—स्त्री एवं पुरुष उस वैश्यकी सुरक्षाके लिये साथ थे। पूजनोपरान्त वह वैश्य तो अपने घर लौट आया। महामते! दीपक बुझ न जायें, इसलिये तुम दोनोंको वहीं रहनेकी आज्ञा दे दी। उस वैश्यके चले जानेपर तुमलोग दीपकोंको भलीभाँति जलाकर वहीं बैठे रहे। राजन्! तुमलोग पूरी एक रात—जबतक सबेरा न हुआ, तबतक वहाँसे नहीं हटे। कुछ दिनोंके बाद आयु समाप्त हो जानेके कारण तुम दोनों स्त्री-पुरुषोंकी मृत्यु हो गयी। उस पुण्यके प्रभावसे राजा प्रियव्रतके घर तुम्हारा जन्म हुआ और तुम्हारी यह पत्नी, जो उस जन्ममें वैश्यके यहाँ दासीका काम करती थी, अब रानी हुई है। वह दीपक दूसरेका था। भगवान् विष्णुके मन्दिरमें केवल उसे प्रज्वलित रखनेका काम तुम्हारा था। यह उसीका ऐसा फल है। फिर जो अपने द्रव्यसे श्रीहरिके सामने दीपक प्रज्वलित करे, उसका जो पुण्य है, उसकी संख्या तो की ही नहीं जा सकती। इसीसे मैंने कहा—‘राजन्! आप धन्य हैं!’ आप धन्य हैं!’ सत्ययुगमें पूरे वर्षतक, त्रेतायुगमें आधे वर्षतक तथा द्वापरयुगमें तीन महीनोंतक भक्तिपूर्वक श्रीहरिकी पूजा करनेसे विद्वान् पुरुष जो फल प्राप्त करते हैं, कलियुगमें उतना फल केवल ‘नमो नारायणाय’ कहकर प्राप्त किया