Skip to content
SarvaKosh
वराह पुराण

वराह पुराण

Varaha Purana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished414 pages

Page 112 of 414

Read in context
Page 112

अध्याय ४७] बुद्ध-द्वादशीव्रत [१०१

इस प्रकार सम्यक् रीतिसे पूजाकर पहलेके ही समान कलश स्थापित करे और दो वस्त्रोंसे उसे आच्छादितकर उसके ऊपर सम्पूर्ण संसारको अपने उदरमें धारण करनेकी शक्तिवाले देवेश्वर भगवान् श्रीहरिकी सुवर्णमयी प्रतिमा स्थापित करे। फिर विधानके अनुसार गन्ध, पुष्प आदिसे क्रमशः पूजन करे। तत्पश्चात् पहले-जैसे ही वेद और वेदाङ्गके पारगामी ब्राह्मणको वह प्रतिमा दे दे। मुने! यह विधि श्रावणमासकी एकादशी-व्रतकी कही गयी है। इस प्रकार नियमके साथ यदि व्रत किया जाय तो उसका जो प्रभाव होता है, वह कहता हूँ, सुनो।

प्राचीन समयकी बात है—सत्ययुगमें नृग नामसे प्रसिद्ध एक प्रतापी नरेश थे। जिन्हें आखेट (शिकार)-का बड़ा शौक था। अतः प्रायः वे गहन वनोंमें घूमते रहते थे। एक समयकी बात है, वे घोड़ेपर चढ़कर किसी वनमें बहुत दूर चले गये, जहाँ सिंह, बाघ, हाथी, सर्प और डाकुओंका निवास था। राजा नृगके पास इस समय अन्य कोई सहायक भी न था। वे घोड़ेको खोलकर एक वृक्षके नीचे श्रमसे थककर सो गये। इतनेमें ही रात हो गयी और चौदह हजार व्याधोंका एक दल मृगोंको मारनेके विचारसे वहाँ आ गया। व्याधोंने देखा राजा सोये हैं। उनका शरीर सोने और रत्नोंसे सुशोभित है। लक्ष्मी उनके अङ्ग-अङ्गकी शोभा बढ़ा रही हैं। अतः वे सभी वधिक तुरंत अपने सरदारके पास गये और उसे इसकी सूचना दी। सुवर्ण और रत्नके लोभमें पड़कर वह सरदार भी राजा नृगको मारनेके लिये उद्यत हो गया और वे व्याध हाथमें तलवार लेकर उन सोये हुए राजाके पास पहुँच गये। वे उन्हें पकड़ना ही चाहते थे कि राजाके शरीरसे सहसा चन्दन-माल्यादिसे विभूषित एक स्त्री प्रकट हो गयी। उसने चक्र उठाकर सभी व्याधों तथा म्लेच्छोंको मार डाला। उनका वधकर वह देवी उसी क्षण पुनः राजा नृगके शरीरमें समा गयी। इतनेमें राजा भी जग गये और देखा कि म्लेच्छ नष्ट हो गये हैं और देवी शरीरमें प्रविष्ट हो रही है। अब राजा घोड़ेपर सवार होकर वामदेवजीके आश्रमपर गये और उन्होंने भक्तिपूर्वक उनसे पूछा—'भगवन्! वह स्त्री कौन थी तथा वे मरे हुए व्याध कौन थे? आप मुझपर प्रसन्न होकर इस आश्चर्यजनक घटनाका रहस्य बतानेकी कृपा कीजिये।'

वामदेवजी बोले—राजन्! इसके पूर्वजन्ममें शूद्रजातिमें तुम्हारा जन्म हुआ था। उस समय ब्राह्मणोंके मुखसे तुमने श्रावणमासके शुक्ल-पक्षकी द्वादशीव्रतके अनुष्ठानकी बात सुनी और राजन्! बड़ी श्रद्धाके साथ विधिपूर्वक तुमने उस दिन उपवास भी किया। अनघ! उसीका परिणाम है कि इस समय तुम्हें राज्य उपलब्ध हुआ है। वही द्वादशीदेवी सम्पूर्ण आपत्तियोंमें साकार होकर तुम्हारी रक्षा करती हैं। उसीके प्रयाससे ये घोर पापी एवं निर्दयी म्लेच्छ जीवनसे हाथ धो बैठे हैं। राजन्! श्रावण मासकी यह द्वादशी ही तुम्हारी रक्षिका है। इसमें इतनी अपार शक्ति है कि सहसा प्राप्त विपत्ति-कालमें भी तुम्हारी रक्षा हो जाती है और इसकी कृपासे तुम्हें राज्य भी सुलभ हो गया है। अब जो बारह मासोंकी द्वादशी करते हैं, उनके पुण्यका तो कहना ही क्या है। उनके प्रभावसे तो मानव इन्द्रलोकतक पहुँच जाता है।

[अध्याय ४७]