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वराह पुराण

वराह पुराण

Varaha Purana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished414 pages

Page 110 of 414

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Page 110

अध्याय ४५-४६ ] श्रीराम एवं श्रीकृष्ण-द्वादशीव्रत ९९

मुझे कोई संतान नहीं है। द्विजवर ! इस कारण तपस्याद्वारा अपने शरीरको मैं सुखाना चाहता हूँ।

याज्ञवल्क्यजी बोले—राजन् ! तपस्यामें बड़ा क्लेश उठाना पड़ता है, अतः तुम यह विचार छोड़ दो। मैं तुम्हें अत्यन्त सरल उपाय बताता हूँ। उसे करनेसे तुम्हें अवश्य पुत्र प्राप्त हो जायगा।

फिर उन्होंने उस यशस्वी राजाको इस वैशाख मासके शुक्लपक्षमें होनेवाला यही परशुराम-द्वादशीव्रत बतलाया। पुत्रकी अभिलाषा रखनेवाले राजा वीरसेनने भी पूर्ण विधिके साथ यह व्रत सम्पन्न किया। फलस्वरूप उन्हें राजा नल-जैसा परम धार्मिक पुत्र प्राप्त हुआ, जिन ‘पुण्यश्लोक’ राजाकी कीर्ति अबतक संसारमें गायी जाती है। यह तो इस व्रतके फलका प्रासङ्गिक उल्लेखमात्र हुआ, वस्तुतः जो यह व्रत करता है, उसे सुपुत्र तथा जीवनभर विद्या, श्री और कान्ति सब सुलभ हो जाती है और परलोकमें उसे जो सुख होता है, वह कहता हूँ, सुनो। इस व्रतको करनेवाले व्यक्ति एक कल्पतक, अप्सराओंके साथ आनन्द करते हुए ब्रह्माजीके लोकमें रहते हैं। फिर जब पुनः सृष्टि आरम्भ होती है तब वे चक्रवर्ती राजा होते हैं और तीस हजार वर्षोंकी उन्हें लम्बी आयु प्राप्त होती है।

[अध्याय ४४]


श्रीराम एवं श्रीकृष्ण-द्वादशीव्रत

दुर्वासाजी कहते हैं—इसी प्रकार ज्येष्ठमासके शुक्लपक्षमें श्रीराम-द्वादशी व्रत होता है। मनुष्यको चाहिये कि वह संकल्प करके विधिके साथ विविध प्रकारके पवित्र पुष्पोंसे परम प्रभु परमात्माकी पूजा करे। ‘ॐ रामाभिरामाय नमः’ कहकर श्रीभगवान्‌के दोनों चरणोंकी, ‘ॐ त्रिविक्रमाय नमः’ कहकर कटिदेशकी, ‘ॐ धृतविश्वाय नमः’ कहकर उनके उदरकी, ‘ॐ संवत्सराय नमः’ से हृदयकी, ‘ॐ संवर्तकाय नमः’ से कण्ठकी, ‘ॐ सर्वास्त्रधारिणे नमः’ से भुजाओंकी, ‘ॐ पाञ्चजन्याय नमः’ से शङ्खकी तथा ‘ॐ सुदर्शनचक्राय नमः’ से चक्रकी एवं ‘ॐ सहस्रशिरसे नमः’ से भगवान्‌के शिरःप्रदेशकी पूजा करे। इस प्रकार विधिवत् पूजाकर पूर्वोक्त विधिद्वारा एक कलश स्थापितकर उसे वस्त्रसे आच्छादित करे। फिर उस कलशपर भगवान् राम एवं लक्ष्मणकी सुवर्णमयी प्रतिमा रखकर विधिपूर्वक पूजन करे और पुत्रकी इच्छावाला व्रती प्रातःकाल उन प्रतिमाओंको ब्राह्मणोंको दे दे।

पहले पुत्र न होनेपर महाराज दशरथने भी पुत्रकी कामनासे वसिष्ठजीकी बड़ी आराधनाकर जब पुत्रोत्पत्तिका उपाय पूछा तो मुनिने उन्हें यही विधान बतलाया था। इस व्रतके रहस्यको जानकर राजा दशरथने इसका अनुष्ठान किया, जिसके फलस्वरूप स्वयं भगवान् श्रीहरि महान् शक्तिशाली रामरूपमें उनके पुत्र हुए। महामुने ! उस समय सनातन श्रीहरिने अपनेको (राम, लक्ष्मणादि) चार रूपोंमें विभक्त कर लिया था। यह तो यहाँकी बात हुई, अब परलोककी बात सुनो। जबतक इन्द्र और सम्पूर्ण देवता स्वर्गमें रहते हैं, तबतक इस व्रतका करनेवाला पुरुष स्वर्गमें विविध भोगोंको भोगता है। वहाँकी अवधि समाप्त हो जानेपर वह पुनः मर्त्यलोकमें आता है। यहाँ आनेपर वह सौ यज्ञ करनेवाला राजा होता है। जो इस व्रतको निष्कामभावसे करता है, उस पुरुषके समस्त पाप समाप्त हो जाते हैं। साथ ही उसे भगवान् श्रीहरिका कैवल्य-पद भी प्राप्त हो जाता है, जो स्वच्छ एवं सनातन है।