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सर्वकोश
वैयाकरण सिद्धान्त कौमुदी (भट्टोजि दीक्षित - बालमनोरमा व तत्त्वबोधिनी टीका सम्पूर्ण पूर्वार्ध)

वैयाकरण सिद्धान्त कौमुदी (भट्टोजि दीक्षित - बालमनोरमा व तत्त्वबोधिनी टीका सम्पूर्ण पूर्वार्ध)

Vaiyakarana Siddhanta Kaumudi of Bhattoji Dikshita with Commentary

भट्टोजि दीक्षित (टीकाकार: वासुदेव दीक्षित एवं ज्ञानेन्द्र सरस्वती) द्वारा

DevanagariHindipublished835 पृष्ठ

पृष्ठ 248, कुल 835 में से

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पृष्ठ 248

' (भ्य)?
Look at: भ्य! It has 'भ' joined to 'य': भ्य!
Then 'ष्ठ' = ष + ठ.
So it is: "कालवाचिभ्यष्ठञ् स्यात्" !!
YES! कालवाचिभ्यः + ठञ् = कालवाचिभ्यष्ठञ्!
Of course! कालवाचिन् in masculine/neuter plural ablative/dative is कालवाचिभ्यः!
कालवाचिभ्यः + ठञ् = कालवाचिभ्यष्ठञ्!
That makes 100% sense!

Let's check line 25:
तिकः । पौनःपुनिकः । कथं तर्हि 'शार्वरस्य तमसो निषिद्धये' इति कालिदासः, 'अनुदि-

  • Exactly matches.

Let's check line 26:
तौषसरागेति भारविः, समानकालीनं प्राक्कालीनमित्यादिं च । अपभ्रंशा एवैत इति प्रामाणिकाः ॥
Wait, look at "इत्यादिं च" vs "इत्यादि च":
Is there an anusvara on 'दि'?
Look at line 26: "मित्यादिं च" - there is a clear dot above 'दि'!
And "अपभ्रंशा एवैत इति" vs "एवैते इति":
Look at "एवैत": is it "एवैत" or "ए