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वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

by महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद

Source: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished759 pages

Page 688 of 759

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Page 688

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७२३
प्रशस्तपादभाष्यम्
तमेव संस्कारमपेक्षमाणाद् धनुर्ज्यासंयोगाद् ज्यायां शरे च कर्मोत्पद्यते ।
तत् स्वकारणापेक्षं ज्यायां संस्कारं करोति । तमपेक्षमाण इषुज्यासंयोगो
नोदनम्, तस्मादिषावाद्यं कर्म नोदनापेक्षमिषौ संस्कारमारभते ।
तस्मात् संस्कारान्नोदनसहायात् तावत् कर्माणि भवन्ति यावदिषुज्या-
विभागः, विभागान्निवृत्ते नोदने कर्माण्युत्तरोत्तराणीषु-
में रहनेवाला (स्थितिस्थापक) संस्कार नमे हुये उस धनुष को पहली
अवस्था में ले आता है । उसी समय इस स्थितिस्थापक संस्कार एवं धनुष
और डोरी के संयोग इन दोनों से तीर में क्रिया उत्पन्न होती है । यह क्रिया
अपने कारणीभूत (धनुष और डोरी के संयोग) के साहाय्य से डोरी में
(वेगाख्य) संस्कार को उत्पन्न करती है । इस संस्कार के द्वारा तीर एवं
डोरी इन दोनों में 'नोदन' नाम के संयोग की उत्पत्ति होती है । इस नोदन
संयोग के साहाय्य से तीर की पहली क्रिया तीर में (वेगाख्य) संस्कार
को उत्पन्न करती है । यह संस्कार उक्त नोदनसंयोग की सहायता से
तब तक क्रियाओं को उत्पन्न करता है, जब तक डोरी और तीर का
न्यायकन्दली
ततो विभागाच्छरगुणाङ्गुलिसंयोगविनाशात्तस्मिन् संयोगे विनष्टे प्रतिबन्धकाभावाद्
यदा धनुषि वर्तमानः स्थितिस्थापकः संस्कारो मण्डलीभूतं धनुर्यथावस्थितं स्थाप-
यति । तं संस्कारमपेक्षमाणाद् धनुर्ज्यासंयोगाद् ज्यायां शरे च कर्मोत्पद्यते । तत्
कर्म स्वकारणापेक्षं धनुर्ज्यासंयोगापेक्षं ज्यायां संस्कारं वेगाख्यं करोति, तं च
संस्कारमपेक्षमाण इषुज्यासंयोगो नोदनम्, नोद्यस्येषोर्नोदकस्य गुणस्य सहगमन-
हेतुत्वात् । तस्माद् नोदनादिषावाद्यं कर्म संस्कारमारभते । तस्मात् संस्काराद्
नोदनसहायात् तावत् कर्माणि भवन्ति यावदिषुज्याविभागः ।
साथ अङ्गुलि का संयोग इन दोनों संयोगों का विनाश हो जाता है । इन संयोगों के
विनष्ट होने पर जिस समय धनुष में रहनेवाला स्थितिस्थापक संस्कार किसी प्रति-
बन्धक के न रहने के कारण नमे हुये धनुष को अपनी पहली अवस्था में ले आता है,
(उसी समय) इस स्थितिस्थापक संस्कार के साहाय्य से ही धनुष और डोरी के संयोग
के द्वारा डोरी में और शर में क्रिया उत्पन्न होती है । 'तत्' अर्थात् वह कर्म 'स्वकारणा-
पेक्षम्' अर्थात् धनुष और डोरी के संयोग का साहाय्य पाकर डोरी में संस्कार को अर्थात्
वेग नाम के संस्कार को उत्पन्न करता है । उसी वेग से तीर और डोरी का 'नोदन',
संयोग उत्पन्न होता है, (वह संयोग नोदनरूप इसलिए है कि) नोद्य (प्रेर्य) जो तीर
और नोदक (प्रेरक) जो डोरी इन दोनों में साथ-साथ गमन क्रिया के उत्पादन का हेतु
है । इस नोदन संयोग के साहाय्य से पहली क्रिया तीर में संस्कार को उत्पन्न करती है ।