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वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

by महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद

Source: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished759 pages

Page 687 of 759

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Page 687

७२२ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ कर्मनिरूपण-
प्रशस्तपादभाष्यम्
सर्वं युगपत् । एवमाकर्णादाकृष्टे धनुषि नातः परमेनैन गन्तव्यमिति यज्ज्ञानं
ततस्तदाकर्षणार्थस्य प्रयत्नस्य विनाशस्ततः पुनर्मोक्षणेच्छा सञ्जायते, तदनन्तरं
प्रयत्नस्तमपेक्षमाणादात्माङ्गुलिसंयोगादङ्गुलिकर्म, तस्माज्ज्याङ्गुलिविभागः, ततो
विभागात् संयोगविनाशः, तस्मिन् विनष्टे प्रतिबन्धकाभावाद् यदा धनुषि
वर्तमानः स्थितिस्थापकः संस्कारो मण्डलीभूतं धनुर्र्यथावस्थितं स्थापयति, तदा
संयोग भी सहायक हैं । ये सभी काम एक ही समय होते हैं । इस
प्रकार कान तक धनुष के खींचे जाने पर 'इसको इससे आगे नहीं
जाना चाहिए' इस आकार का (संकल्पात्मक) ज्ञान (उत्पन्न होता है) ।
इस ज्ञान से आकर्षण के कारणीभूत प्रयत्न का विनाश हो जाता है ।
फिर उसे छोड़ने की इच्छा उत्पन्न होती है । इसके बाद तदनुकूल प्रयत्न
की उत्पत्ति होती है । आत्मा और अङ्गुलि के संयोग से अङ्गुलि में क्रिया की
उत्पत्ति होती है, जिसमें उक्त प्रयत्न का साहाय्य भी अपेक्षित होता है ।
अङ्गुलि की इस क्रिया से डोरी और अङ्गुलि में विभाग उत्पन्न होता है ।
इस विभाग से (डोरी और अङ्गुलि के) संयोग का विनाश होता है। उस
संयोग के नष्ट हो जाने पर किसी प्रतिबन्धक के न रहने के कारण धनुष
न्यायकन्दली
कर्मणी धनुष्कोट्योरित्येतत् सर्वं युगपत्, कारणयौगपद्यात् । एवमाकर्णादाकृष्टे धनुषि
नातः परमेनैन हस्तेन गन्तव्यमिति यद् ज्ञानं तस्मात् । तदाकर्षणार्थस्येति धनुरा-
कर्षणार्थस्य प्रयत्नस्य विनाश इति ।
ततः शरस्य गुणस्य च मोक्षणेच्छा च । तदनन्तरं प्रयत्नो मोक्षणार्थः,
तमपेक्षमाणादात्माङ्गुलिसंयोगादङ्गुलिकर्म । तस्माद् ज्याङ्गुलिविभागः, शरगुणाभ्याम् ।
युगपत्' क्योंकि सब की सामग्री एक ही समय उपस्थित है । 'एवमाकर्णादाकृष्टे
धनुषि नातः परमेनैन हस्तेन गन्तव्यमिति यज्ज्ञानम्' अर्थात् उसी ज्ञान से
'तदाकर्षणार्थस्य' धनुष को अपनी ओर खींचने के लिए जो प्रयत्न था, उसका
विनाश होता है ।
इसके बाद तीर और डोरी को छोड़ देने की इच्छा होती है, उसके बाद
छोड़ने के अनुकूल प्रयत्न की उत्पत्ति होती है 'तमपेक्षमाणादात्माङ्गुलिसंयोगादङ्गुलिकर्म,
तस्माज्ज्याङ्गुलिविभागः' अर्थात् डोरी का शर से और अङ्गुलि का डोरी से विभाग
उत्पन्न होता है । इस विभाग से शर का और डोरी का संयोग और डोरी के