वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 579, कुल 759 में से
संदर्भ में पढ़ें६१४ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणेऽनुमानेऽवयव-
प्रशस्तपादभाष्यम्
प्रसङ्गात् । तथा हि प्रतिज्ञानानन्तरं हेतुमात्राभिधानं कर्तव्यम्, विदुषामन्वयव्यति-
रेकस्मरणात् तदर्थावगतिर्भविष्यतीति, तस्मादत्रैवार्थपरिसमाप्तिः ।
फिर उक्त पक्ष में (केवल प्रतिज्ञा और हेतु वाक्य को छोड़कर निदर्शन
और अनुसन्धान इन दोनों के भी वैयर्थ्य की आपत्ति होगी); क्योंकि
(पूर्वपक्षवादी की रीति के अनुसार) प्रतिज्ञावाक्य के बाद केवल हेतु-
वाक्य के प्रयोग से ही प्रकृत प्रयोजन की निष्पत्ति हो जाएगी; क्योंकि
(व्याप्ति से) अभिज्ञ पुरुष को (व्याप्ति के कारणीभूत) अन्वय और
व्यतिरेक का स्मरण यों ही (बिना निदर्शनवाक्य और अनुसन्धानवाक्य
के सुने ही) हो जाएगा । (प्रतिज्ञावाक्य के प्रयोग के बाद हेतुवाक्य का
प्रयोग होने के बाद ही) अभीष्ट अर्थ का बोध सम्पन्न हो जाएगा ।
अतः (प्रतिज्ञादि चार अवयवों के प्रयोग को पूर्वपक्षी जिस दृष्टि
से आवश्यक मानते हैं, उसी दृष्टि से उन्हें मानना होगा कि) प्रत्या-
म्नाय पर्यन्त पाँच अवयववाक्यों के प्रयोग से ही अभीष्ट अर्थ के ज्ञान
की समाप्ति हो सकती है ।
न्यायकन्दली
हेत्यादिभिरवयवैः पक्षधर्मतान्वयव्यतिरेकोपपन्नं लिङ्गम् । तावतैव च तस्मादर्थावगतिसम्भ-
वात् कृतं निगमनेनेति । समाधत्ते-नातिप्रसङ्गादिति । वाक्यं लिङ्गसामर्थ्यमेव बोधयति
न साध्यम्; किन्तु न तस्य सामर्थ्यं बह्व्याप्तिपक्षधर्मतामात्रम्, सत्यपि तस्मिन्
प्रकरणसमकालात्ययापदिष्टयोरसाधकत्वात्, अपि त्वबाधितविषयत्वमसत्प्रतिपक्षत्वमपि
सामर्थ्यम् । तत्सद्भावो यावत्प्रमाणेन न प्रतिपाद्यते, तावत्प्रतिपक्षसम्भव्याशङ्काया अनिवर्त्त-
नात् । धर्मिण्युपसंहृतेऽपि साधने साध्यप्रतीतेरयोग इति विपरीतप्रमाणाभावग्राहकं
(व्याप्ति) एवं पक्षधर्मता इन दोनों से युक्त हेतु की उपस्थिति तो हेतु उदाहरण
और उपनय इन्हीं अवयवों से सम्पन्न हो जाती है, फिर कौन-सी आवश्यकता
अवशिष्ट रह जाती है, जिसके लिए निगमनवाक्य का प्रयोग आवश्यक होता
है ? "न, अतिप्रसङ्गात्" इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा इस आक्षेप का समाधान करते
हैं । (उदाहरणादि अवयव) वाक्यों से लिङ्ग के (व्याप्ति और पक्षधर्मतारूप)
सामर्थ्य का ही बोध होता है, साध्य का नहीं; किन्तु केवल व्याप्ति और पक्षधर्मता
ये ही दोनों हेतु के सामर्थ्य नहीं हैं; क्योंकि उक्त सामर्थ्य के रहने पर भी
प्रकरणसम (सत्प्रतिपक्षित) और कालात्ययापदिष्ट (बाधित) हेतु से साध्य की
सिद्धि नहीं होती । अतः हेतु में साध्यसिद्धि के उपयुक्त सामर्थ्य के लिए यह
भी आवश्यक है कि पक्ष में उसके साध्य का बाध न हो, एवं पक्ष में उसके साध्य
के अभाव का साधक कोई दूसरा हेतु न रहे, फलतः अबाधितविषयत्व
और असत्प्रतिपक्षित्व ये दोनों भी हेतु के सामर्थ्य हैं । प्रमाण के द्वारा जब तक