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वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

by महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद

Source: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished759 pages

Page 413 of 759

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Page 413

४४८ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे प्रत्यक्ष-
न्यायकन्दली
सविकल्पकं सामान्यविशेषरूपतां प्रत्येति पिण्डान्तरमनुसन्दधानस्यात्मनोऽनुवृत्तिव्यावृत्ती धर्मो
प्रतिपद्यमानस्येन्द्रियद्वारेण तथाभूतप्रतीत्युत्पत्तेः ।
सौगताः पुनरेवमाहुः-स्वलक्षणान्वयव्यतिरेकानुविधायिप्रतिभासं निर्विकल्पकं वस्तुन्य-
भ्रान्तम्, अतस्तदेव प्रत्यक्षं न सविकल्पकम्, तस्य वासनाधीनजन्मनो वस्त्वनुरोधिप्रतिभा-
सस्य केशादिज्ञानवद् वस्तुनि भ्रान्तत्वादिति । तेषां मतं निराकर्तुं सविकल्पकस्यापि
प्रत्यक्षतामाह-सामान्येत्यादि ।
सामान्यं च विशेषश्च द्रव्यं च गुणश्च कर्म च सामान्यविशेषद्रव्यगुणकर्माणि,
सानान्यविशेषद्रव्यगुणकर्माण्येव विशेषणानि सामान्यविशेषद्रव्यगुणकर्मविशेषणानि, तान्य-
पेक्षते य आत्ममनःसन्निकर्षः, तस्मात् सद्द्रव्यमिति सामान्यविशिष्टम् । पृथिवीति
पृथिवीत्वविशिष्टम्, विषाणीति द्रव्यविशिष्टम् शुक्लो गौरिति गुणविशिष्टम् गच्छतीति
कर्मविशिष्टं प्रत्यक्षं स्यात् । चतुष्टयसन्निकर्षादित्यनेनैवात्ममनःसंयोगे लब्धे
सकती है, जिसे निर्विकल्पक ज्ञान में भासित होनेवाले उसके सजातीय पिण्डों का
अनुसन्धान रहे एवं (जिसका निर्विकल्पक ज्ञान हो एवं जिसका उक्त अनुसन्धान
हो ) इन दोनों में अनुवृत्ति प्रत्यय के कारणीभूत सामान्य और व्यावृत्ति प्रत्यय के
कारणीभूत विशेष दोनों का ज्ञान भी रहे ।
बौद्धों का कहना है कि निर्विकल्पक ज्ञान ही प्रत्यक्ष प्रमाण है, सविकल्पक
ज्ञान नहीं, क्योंकि निर्विकल्पक ज्ञान के ही साथ विषय के स्वलक्षण (असाधारण-
धर्म) का अन्वय और व्यतिरेक है, अतः वही अपने विषय में अभ्रान्त है । चूँकि
सविकल्पक ज्ञान वासना के अधीन है, वह अपनी उत्पत्ति के लिए विषयवस्तु का
अनुरोध नहीं रखता । अतः केशराशि के ज्ञान की तरह सविकल्पक ज्ञान अपने
विषयवस्तु में भ्रान्त है । बौद्धों के इस मत को खण्डित करने के लिए ही
'सामान्य' इत्यादि ग्रन्थ से 'सविकल्पकज्ञान भी प्रत्यक्ष प्रमाण है' यह उपपादन
किया गया है ।
सामान्यञ्च, विशेषश्च, द्रव्यञ्च, गुणश्च, कर्म च सामान्यविशेषद्रव्यगुणकर्माणि,
(द्वन्द्व) सामान्यविशेषद्रव्यगुणकर्माण्येव विशेषणानि सामान्यविशेषद्रव्यगुणकर्म-
विशेषणानि (कर्मधारय), तान्यपेक्षते यः आत्ममनःसंनिकर्षः, 'तस्मात्' इस
व्युत्पत्ति के अनुसार सामान्य, विशेष, द्रव्य, गुण, और कर्म स्वरूप विशेषणों के
साहाय्य से आत्मा और मन के संनिकर्ष के द्वारा 'सद् द्रव्यम्' इस आकार का
सत्ता (सामान्य) विशिष्ट द्रव्य का ज्ञान, 'इयं पृथिवी' इस आकार का पृथिवीत्व
रूप विशेष प्रकारक ज्ञान, 'अयं विषाणी' इस आकार का द्रव्य विशेषणक ज्ञान,
'शुक्लो गौः' इस आकार का गुणविशेषणक ज्ञान, 'गौर्गच्छति' इस आकार
का कर्मप्रकारक ज्ञान, ये जितने भी ज्ञान उत्पन्न होते हैं, वे सभी