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वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

by महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद

Source: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (origin)

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DevanagariSanskritpublished759 pages

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भूमिका ३३
पक्षता के ये जितने भी लक्षण कहे गये हैं, उन सभी लक्षणों का तत्त्वचिन्ता-
मणिकार ने खण्डन किया है । खण्डन की युक्तियों को विस्तृत रूप से चिन्तामणि
के पक्षता प्रकरण में देखना चाहिए । संक्षेप में तत्त्वचिन्तामणिकार कहना है कि
एक अनुमिति के रहते हुए परामर्शादि सभी कारणों के रहने पर भी जब दूसरी
अनुमिति नहीं होती है, तो पहली अनुमिति या सिद्धि को दूसरी अनुमिति का
प्रतिबन्धक मानना पड़ेगा; क्योंकि और सभी कारणों के रहने पर भी जिसके
रहते कार्य उत्पन्न न हो सके, उसे ही कार्य का प्रतिबन्धक कहा जाता है ।
प्रतिबन्धक का अभाव भी कार्य का एक कारण ही है । अतः प्रकृत में सिद्धि का
भी अभाव भी अनुमिति का एक कारण है । जिसके चलते एक अनुमिति के बाद
तुरन्त दूसरी अनुमिति नहीं हो पाती । अतः सिद्धि का अभाव ही पक्षता है;
किन्तु कभी-कभी एक सिद्धि के रहते हुए भी विषय को विशेष प्रकार की जानने
की इच्छा से तुरन्त दूसरी अनुमिति होती है । जैसे कि आत्मा को विशेष प्रकार से
सजाने की इच्छा से आत्मा के श्रवण रूप सिद्धि के बाद भी मनन (अनुमिति) का
विधान 'आत्मा वारे श्रोतव्यो मन्तव्यः' इत्यादि श्रुतियों के द्वारा किया गया है ।
अगर जिस किसी भी प्रकार की भी सिद्धि के रहने पर दूसरी अनुमिति के रूप
सिद्धि बिलकुल ही नहो, तो फिर उक्त विधान असङ्गत हो जाएगा । अतः इतना
इसमें जोड़ना आवश्यक है कि विशेष प्रकार की अनुमिति या सिद्धि की इच्छा
रहने पर एक सिद्धि के रहने पर भी दूसरी अनुमिति होती है । अतः सामान्य
रूप से सभी सिद्धियाँ अनुमिति की विरोधिनी नहीं हैं; किन्तु अनुमिति की इच्छा
से असंश्लिष्ट अथवा यों कहिये कि सिषाधयिषा के विरह से युक्त सिद्धि ही
अनुमिति की विरोधिनी है । फलतः सिषाधयिषा के विरह से युक्त जो सिद्धि,
उसका अभाव ही अनुमिति का पक्षतारूप कारण हैं । इसको समझने के लिए
अनुमिति की इन तीन स्थितियों को समझना आवश्यक है-(१) जहाँ परामर्श के
बाद केवल अनुमितिरूप सिद्धि रहेगी, वहाँ उस सिद्धि के अव्यावहित उत्तर क्षण
में अनुमिति नहीं होगी; क्योंकि यहां कथित पक्षतारूप कारण नहीं है । यहाँ सिद्धि
अनुमित्सा या सिषाधयिषा से युक्त नहीं है, सिषाधयिषा के विरह से युक्त है ।
अतः यह सिद्धि अनुमिति का प्रतिबन्धक है । सुतरां प्रतिबन्धकाभावरूप कारण
या कथित पक्षतारूप कारण के न रहने से अनुमिति का प्रतिरोध होता है । (२)
जहाँ परामर्शादि कारणों के साथ अगर सिषाधयिषा भी है तो फिर उक्त
परामर्शजनित अनुमितिरूप सिद्धि के बाद पुनः अनुमिति होगी; क्योंकि यह
अनुमितिरूप सिद्धि सिषाधयिषा से युक्त नहीं है, अतः सिषाधयिषा के विरह से