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वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

by महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद

Source: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (origin)

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DevanagariSanskritpublished759 pages

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३२ प्रशस्तपादभाष्यम्
इन दोनों रूपों से हेतु का परामर्श रूप तीसरा ज्ञान होता है, अतः उसे "तृतीय
लिङ्गपरामर्श" कहते हैं । इसके बाद ही अनुमिति की उत्पत्ति होती है ।
पक्षता
इस प्रसङ्ग में एक विचार उठता है कि प्रायः सभी ज्ञान दो क्षणों तक रहते
हैं, तीसरे क्षण में उनका विनाश होता है । कथित परामर्श भी ज्ञान है, अतः
वह भी दो क्षणों तक रहेगा । जिस क्षण में वह उत्पन्न होगा, उसके अव्यवहित
उत्तरक्षण में जिस प्रकार की अनुमिति को उत्पन्न करेगा, इस अनुमिति के अगले
क्षण में भी उसी प्रकार की अनुमिति को वह क्यों नहीं उत्पन्न करता ? क्योंकि
कथित दूसरी अनुमिति के अव्यवहित पूर्वक्षण में अर्थात् पहली अनुमिति के
उत्पत्तिक्षण में परामर्श की सत्ता है । एवं परामर्श अनुमिति का अन्यनिरपेक्ष
कारण है । परामर्श संवलन के बाद अनुमिति के लिए और किसी की अपेक्षा
नहीं रह जाती । सुतरां परामर्श अगर अपने उत्पत्तिक्षण के अव्यवहित उत्तरक्षण
में जिस विषय की जिस आकार-प्रकार की अनुमिति को उत्पन्न करेगा, उसी
आकार-प्रकार की उसी विषय की दूसरी अनुमिति को भी अपने स्थितिक्षण के
अव्यवहित उत्तरक्षण में फलतः पहली अनुमिति के अव्यवहित उत्तरक्षण में उत्पन्न
करने में कोई बाधा तो नहीं है ? किन्तु ऐसी बात होती नहीं है । अनुमान को
जितने माननेवाले दार्शनिक हैं, उनमें से कोई भी एक आकार-प्रकार की अनुमिति
के रहते हुए उसी आकार-प्रकार की दूसरी अनुमिति की सत्ता को स्वीकार नहीं
करते; किन्तु किसी की स्वीकृति और अस्वीकृति मात्र पर वस्तु के सामर्थ्य को
अन्यथा नहीं किया जा सकता । फलतः एक अनुमिति रूप सिद्धि के रहते हुए
परामर्श के रहने पर भी दूसरी अनुमिति न हो सके, इसके लिए परामर्श के समान
ही अनुमिति का एक और साक्षात् कारण माना गया है, जिसका नाम है 'पक्षता' ।
इसका ऐसा स्वरूप या लक्षण होना चाहिए, जिससे एक अनुमिति या अन्य किसी
प्रकार की सिद्धि के रहते हुए कथित दूसरी अनुमिति की आपत्ति न हो सके। इसी
प्रयोजन को सामने रखकर पक्षता के अनेकलक्षण किये गये हैं । जैसे कि (१) साध्य
का संशय ही पक्षता है । (२) अनुमित्सा ही पक्षता है । (३) अथवा अनुमित्सा
की योग्यता पक्षता है । (४) सिद्धि का अभाव ही पक्षता है । पक्षता के इन सभी
लक्षण करनेवालों की यही दृष्टि रही है कि अनुमिति या अन्य किसी भी प्रकार
की सिद्धि के रहते हुए उक्त प्रकार के लक्षणों से आक्रान्त किसी भी पक्षतारूप
कारण का रहना सम्भव न हो; क्योंकि सभी के साथ सिद्धि का विरोध है । अतः
सिद्धि के रहते हुए पक्षतारूप कारण का संवलन सम्भव ही नहीं है । अतः एक
अनुमिति के बाद दूसरी अनुमिति की आपत्ति नहीं दी जा सकती ।