वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
by महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद
Source: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (origin)
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Read in contextभूमिका २९
दूसरे प्रश्न का यह समाधान है कि कथित आरम्भकर संयोग के विरोधी
विभाग से युक्त अवयवों का दूसरे आकाशादि देशों के साथ तब तक संयोग नहीं
हो सकता जब तक कि अवयवी विनष्ट नहीं हो जाता । अतः क्रिया से विभाग,
विभाग से पूर्व (आरम्भक) संयोग का नाश, संयोग के इस नाश से घट का नाश
जब हो जाएगा तभी घट के उत्पादक उक्त विभक्त कपालों का दूसरे देशों के साथ
संयोग उत्पन्न हो सकता है । अतः उक्त रीति माननी पड़ती है ।
परत्व और अपरत्व
परत्व और अपरत्व ये दोनों ही दैशिक और कालिक भेद से दो-दो प्रकार के
हैं । एक वस्तु से दूसरी वस्तु की दूरी दैशिक परत्व है और एक वस्तु का दूसरे
वस्तु से समीप होना दैशिक अपरत्व है । ये दोनों ही आपेक्षिक हैं, अतः
अपेक्षाबुद्धि ही इनकी कारण है और तीसरी अवधि की भी अपेक्षा होती है ।
जैसे कि पटना से काशी की अपेक्षा प्रयाग दूर है एवं पटना से प्रयाग की अपेक्षा
काशी समीप है ।
कालिक परत्व का ही दूसरा नाम ज्येष्ठत्व है । एवं कालिक अपरत्व का ही
दूसरा नाम कनिष्ठत्व है । कालिक परत्व और अपरत्व भी आपेक्षिक हैं; क्योंकि
जो कोई व्यक्ति एक व्यक्ति से ज्येष्ठ होता है, वही अपने से पूर्ववर्त्ती की अपेक्षा
कनिष्ठ भी होता है । एवं जो कोई व्यक्ति एक व्यक्ति से कनिष्ठ होता है, वही
अपने से पश्चाद्वर्त्ती की अपेक्षा ज्येष्ठ भी होता है । अतः इनमें भी अपेक्षाबुद्धि
की आवश्यकता होती है । अतः अपेक्षाबुद्धि के नाश से इनका नाश होता है ।
परत्व और अपरत्व दोनों ही बुद्धिसापेक्ष हैं । अतः इनके निरूपण के बाद ही
आकर-ग्रन्थों में बुद्धि का निरूपण किया गया है । तदनुसार मैं भी अब बुद्धि का
निरूपण प्रारम्भ करता हूँ । बुद्धि के निरूपण में नव्यन्याय की दृष्टि से भी कुछ
विषयों को समझाने का मैंने प्रयास किया है ।
बुद्धि
संसार के सभी व्यवहारों के मूल में बुद्धि ही काम करती है । संक्षेपतः (१)
प्रमा (विद्या) और (२) अप्रमा (अविद्या) इसके दो भेद हैं । इनमें अप्रमा के (१)
संशय, (२) विपर्यय, (३) अनध्यवसाय और (४) तर्क, ये चार भेद हैं ।
ज्ञान या बुद्धि को अच्छी तरह से समझने के लिए उसके विशिष्ट स्वरूप के
प्रत्येक अंश को अच्छी तरह समझ लेना आवश्यक है । नैयायिकों और वैशेषिकों
के मत में ज्ञान किसी विषय का ही होता है । बिना विषय के ज्ञान नहीं होते ।
ज्ञान में भासित होनेवाले विषय (१) विशेषण, (२) विशेष्य और (३) उन दोनों