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वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

by महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद

Source: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (origin)

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DevanagariSanskritpublished759 pages

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२८ प्रशस्तपादभाष्यम्
क्षणों बाद तक रहती है । फिर विभाग में विभाग की हेतुता की नयी कल्पना
क्यों की जाती है ? दूसरी बात यह है कि अगर उक्त दूसरे विभाग की उत्पत्ति
विभाग से ही मान भी लें तो यह पहला विभाग दूसरे विभाग का
असमवायिकारण ही होगा । असमवायिकारण का संचलन हो जाने पर कार्य की
उत्पत्ति में कोई बाधा नहीं रह जाती है । फिर अवयवों के विभाग के बाद ही
अवयवी के नाश से पूर्व ही उक्त दूसरे देश के साथ अवयवों का (विभागज)
विभाग क्यों नहीं उत्पन्न हो जाता ? इसके लिए घट के उत्पादक संयोग का
विनाश और घट का विनाश इन दो कार्यों के लिए अपेक्षित दो क्षणों का विलम्ब
सहने की क्या आवश्यकता है ?
इन दोनों में प्रथम प्रश्न का यह समाधान है कि अगर उक्त दूसरे विभाग को
भी क्रियाजन्य मानें तो कमल खिलने की अपेक्षा विनष्ट ही हो जाएँगे; क्योंकि
संयोग दो प्रकार के हैं । एक संयोग से अवयवी की उत्पत्ति होती है, जैसे दोनों
कपालों का कथित संयोग । इसे 'आरम्भक' संयोग कहते हैं, क्योंकि यह संयोग
घटरूप अवयवी द्रव्य का 'आरम्भक' अर्थात् 'उत्पादक' है । दूसरा संयोग है
अनारम्भक संयोग, जैसे विभक्त कपालों का दूसरे देश के आकाश के साथ
संयोग । इससे किसी द्रव्य की उत्पत्ति नहीं होती है । अतः इसे 'अनारम्भक'
संयोग कहते हैं । फलतः वे दोनों संयोग परस्पर विरोधी हैं, अतः एक क्रियारूप
कारण से उन दोनों की उत्पत्ति नहीं हो सकती । अगर इसे मानने का हठ करें
तो फूलते हुए कमल के विनाश की उक्त आपत्ति होगी; क्योंकि कमल के पत्रों का
ऊपर की ओर जो परस्पर संयोग है, यह कमल का उत्पादक संयोग नहीं है ।
उस संयोग को नष्ट करनेवाला विभाग ही कमल का फूलना है । जो सूर्य-किरणों
के संयोग से उत्पन्न होनेवाली पत्रों की क्रिया से होता है । कमल के पत्रों का ही
नीचे की ओर डण्डी के ऊपर अंश में भी परस्पर संयोग है । जो कमल का
उत्पादक संयोग है । इस संयोग का विनाश उन रविकिरणों के उक्त क्रियाजनित
विभाग से नहीं होता है । यदि आग्रहवश ऐसा मानें तो कमल का विनाश मानना
पड़ेगा; क्योंकि अवयवों का विशेष प्रकार संयोग ही अवयवी का उत्पादक है एवं
उक्त संयोग का विनाश ही अवयवी का विनाशक है । तस्मात् अवयवियों के
उत्पादक संयोग के विनाशक विभाग और उक्त संयोग के अविनाशक विभाग
दोनों की उत्पत्ति एक क्रिया से नहीं हो सकती । अतः प्रकृत में कपालों के संयोग
को नष्ट करनेवाले विभाग की उत्पत्ति क्रिया से मानते हैं और उन्हीं विभक्त
कपालों के पूर्वदेशसंयोग के विनाशक विभाग की उत्पत्ति कपालों के उक्त विभाग
से मानते हैं । अतः विभागजविभाग का मानना आवश्यक है ।