वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
by महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद
Source: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (origin)
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Read in context३० प्रशस्तपादभाष्यम्
नहीं है। शुक्ल रूप भास्वर और अभास्वर भेद से दो प्रकार का है। जल में
अभास्वर शुक्ल रूप है और तेज में भास्वर शुक्ल रूप है।
रस
केवल रसनेन्द्रिय से ज्ञात होनेवाले गुण को रस कहते हैं। यह मधुर, अम्ल,
लवण, कटु, कषाय और तिक्त भेद से छः प्रकार का है। यह पृथिवी और जल
इन दो द्रव्यों में ही रहता है। पृथिवी में सभी प्रकार के रस रहते हैं और जल में
केवल मधुर रस ही रहता है।
गन्ध
घ्राण से ज्ञात होनेवाले गुण को 'गन्ध' कहते हैं। यह सुगन्ध और दुर्गन्ध भेद
से दो प्रकार का है एवं यह केवल पृथिवी में ही रहता है।
स्पर्श
केवल त्वचा रूप इन्द्रिय से ज्ञात हो सकनेवाले गुण को स्पर्श कहते हैं। यह
पृथिवी, जल, तेज और वायु इन चार द्रव्यों में रहता है। शीत, उष्ण और
अनुष्णाशीत भेद से यह चार प्रकार का है। शीत स्पर्श जल में, उष्ण स्पर्श तेज
में, अनुष्णाशीत स्पर्श पृथिवी और वायु में रहता है। अनुष्णाशीत स्पर्श भी
पाकज और अपाकज भेद से दो प्रकार का है। इनमें पाकज अनुष्णाशीत स्पर्श
पृथिवी में (पाक से पृथिवी का अनुष्णाशीत स्पर्श परिवर्तित हो सकता है) और
अपाकज अनुष्णाशीत स्पर्श वायु में रहता है।
इनमें से जल के परमाणुओं में रहनेवाले रूप, रस, और स्पर्श एवं तेज के
परमाणुओं में रहनेवाले रूप और स्पर्श और वायु के परमाणुओं में रहनेवाले स्पर्श
नित्य हैं। एवं कार्य रूप जलादि में रहनेवाले रूपादि अनित्य हैं; किन्तु पृथिवी के
परमाणुओं में रहनेवाले रूप, रस, गन्ध और स्पर्श भी अनित्य ही हैं। कार्य रूप
पृथिवी में रहनेवाले रूपादि तो अनित्य हैं ही।
इसका यह हेतु है कि पाक के द्वारा पृथिवी में रहनेवाले रूप, रस, गन्ध और
स्पर्श का परिवर्तित होना प्रत्यक्ष से सिद्ध है। अवयवियों के रूपादि का यह
परिवर्तन परमावयव परमाणुओं में रूपादि परिवर्तन के बिना संभव नहीं है। अतः
पार्थिव परमाणुओं के रूपादि को अनित्य मानना पड़ता है। यह वैशेषिक दर्शन का
खास विषय है, अतः इस विषय का विवरण कुछ विस्तृत रूप से देता हूँ।
पाकरूपादि
समवायिकारणों में रहनेवाला गुण ही जन्य द्रव्यों में रहनेवाले गुणों का असम-
वायिकारण है। शतशः देखी हुई यह व्याप्ति ही 'कारणगुणाः कार्यगुणानारभन्ते'