वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
by महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद
Source: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (origin)
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Read in contextप्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् २३५
न्यायकन्दली
अथोच्यते विषयेन्द्रियादिजन्यं विज्ञानं कथमात्मन्येव समवैति ? यद्यात्मा सहज-
ज्ञानमयो न स्यात् । तस्याचेतनत्वे हि कारणत्वाविशेषादिन्द्रियादिष्वपि ज्ञानसमवायो
भवेदिति । तन्न स्वभावनियमादेव नियमोपपत्तेः । यथा तन्तूनामपटत्वेऽपि तन्तुत्व-
जातिनियमात्तेषु समवायो न तुर्यादिषु, तद्वदचिदात्मकेऽप्यात्मन्यात्मत्वजातिनियमाद् ज्ञान-
समवायस्य नियमो भविष्यति ।
एतेनैतदपि प्रत्युक्तं यदाहुरेके 'स्वसंवेदनमात्मनो निजं चैतन्यम्' इति संसारावस्थायामपि
तस्यावभासप्रसङ्गात् । अविद्यया वा तस्य तिरोधानमिति चेत् ? किं ब्रह्मणोऽप्यविद्या ? कथं च
नित्ये स्वप्रकाशे तिरोधानस्यायोयुक्तिः ? न च तिरोहिते तस्मिन्नन्यप्रतिभानमस्ति, 'तस्य भासा
एवं विषयसंवेदन का कारण हों; क्योंकि उसी विषयसंवेदन से अर्थविषयक बोध
एवं तज्जनित व्यवहार दोनों की उपपत्ति हो जायगी ।
अगर यह कहें कि (प्र.) विषय एवं इन्द्रियादि से उत्पन्न ज्ञान तब तक आत्मा
में समवाय सम्बन्ध से कैसे रह सकता है, जब तक कि आत्मा को सहजज्ञानमय
न माना जाय । आत्मा अगर स्वतः अचेतन हो किन्तु ज्ञान का कारण होने से ही
(उसमें) ज्ञान की सत्ता हो तो फिर इन्द्रियादि (रूप ज्ञान के और कारणों) में भी
ज्ञान का समवाय मानना पड़ेगा । (उ.) उक्त कथन भी असङ्गत ही है; क्योंकि
स्वाभाविक नियम के अनुसार ही इस विषय का अवधारण हो जायगा कि ज्ञान
अपने आत्मा रूप कारण में ही समवाय सम्बन्ध से है, इन्द्रियादि रूप कारणों में
नहीं । जैसे कि तन्तु में पटरूपता न रहने पर भी (पट के कारणीभूत) तन्तु में ही
समवाय सम्बन्ध से पट रहता है, तुरी, वेमा प्रभृति अपने अन्य कारणों में नहीं ।
इस नियम को मान लेने से ही आत्मा में ही ज्ञान का समवाय है, इस नियम की
भी उपपत्ति हो जायगी ।
इसी से किसी का यह मत भी खण्डित हो जाता है कि (प्र.) स्वसंवेदन
(स्वतःप्रकाश) ज्ञान आत्मा का स्वकीय चैतन्य ही है (वह ज्ञान अगर स्वतः
प्रकाश और नित्य है तो फिर) संसारावस्था में भी उसका प्रत्यक्ष होना चाहिए ।
अगर यह कहें कि (प्र.) संसारावस्था में वह अविद्या से ढँका रहता है ?
(उ) तो फिर इस विषय में यह पूछना है कि क्या ब्रह्म में भी अविद्या रहती है ?
एवं नित्य एवं स्वप्रकाश रूप ज्ञान के तिरोधान में ही क्या युक्ति है ? एवं
उसके तिरोहित हो जाने पर (संसारावस्था में) और विषयों का ज्ञान भी
असम्भव होगा; क्योंकि 'तस्य भासा सर्वमिदं विभाति' इत्यादि श्रुतियों में कहा