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वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

by महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद

Source: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished759 pages

Page 189 of 759

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Page 189

२३४ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणसाधर्म्यवैधर्म्य-
न्यायकन्दली
हि वर्त्तमानकालविशिष्टता सा चार्थस्य स्वाभाविकी, न ज्ञानेन क्रियते किन्तु प्रतीयते ।
योऽपि हि विषयसंवेदनानुमेयं ज्ञानमिच्छति, सोऽप्येवं पर्यनुयोज्यः-किं विषय-
संवेदनमात्मनि समवैति ? विषये वा ? न तावद्विषये, तच्चैतन्यप्रतिषेधात् । अथात्मनि
समवैति ? ततः किमन्यद्विज्ञानं यदस्यानुमेयम् । अस्य कारणं ज्ञातृव्यापारलक्षणं तदिति
चेत् ? तत्किं नित्यम् ? अनित्यं वा ? यद्यनित्यं तदुत्पत्तावपि कारणं वाच्यम् । विषये-
न्द्रियादिसहकारी ज्ञानमनःसंयोगोऽस्य कारणमिति चेत् ? सैव सामग्री विषयसंवेदनो-
त्पत्तावस्तु किमन्तर्गडुनानेन ? अथ तन्नित्यम् ? कादाचित्कविषयेन्द्रियसन्निकर्षादिसहकारि
कादाचित्कं विषयसंवेदनं करोतीत्यभ्युपगमः, तदस्याप्यागन्तुककारणकलापादेव विषय-
संवेदनोत्पत्तिसिद्धौ तत्कल्पनावैयर्थ्यम् ? विषयसंवेदनादेवार्थावबोधस्य तत्पूर्वकस्य व्यवहा-
रस्य च सिद्धेः ।
वर्तमानकालावच्छिन्नता है । यह उनका स्वाभाविक धर्म है, यह धर्म ज्ञान से उत्पन्न
नहीं होता, ज्ञान के द्वारा प्रतीत भर होता है ।
जो कोई विषयसंवेदन ज्ञान का अनुमान मानते हैं, उन्हें इस प्रकार पराजित
करना चाहिए कि यह 'विषयसंवेदन' समवाय सम्बन्ध से आत्मा में रहता है ? या
विषयों में ? विषयों में तो रह नहीं सकता; क्योंकि विषयों में चैतन्य का खण्डन
कर चुके हैं (देखिए-आत्मनिरूपण, पृ. १७१) । अगर यह समवाय सम्बन्ध से
आत्मा में रहता है तो फिर ज्ञान उससे भिन्न कौन-सी वस्तु है ? जिसका
विषयसंवेदन से अनुमान होता है । (प्र.) अनुमेयज्ञान एवं विषयसंवेदन ये दोनों
भिन्न हैं; क्योंकि (अनुमेय) ज्ञान विषयसंवेदन का कारण और ज्ञाता का व्यापार
है । (उ.) विषयसंवेदन का कारणीभूत ज्ञान नित्य है ? अथवा अनित्य ? अगर
अनित्य है तो फिर उसकी उत्पत्ति के लिए भी अलग से कारण कहना पड़ेगा ।
विषय एवं इन्द्रियादि सहकारियों से युक्त ज्ञाता के मनःसंयोग को अगर उसका
कारण मानें, तो फिर इन्हीं कारणों के समूह से विषयसंवेदन की भी उपपत्ति
मानिये । विषयसंवेदन के उत्पादक कारणों की पंक्ति में उस ज्ञान को बिठाने की
क्या आवश्यकता है ? अगर उस अनुमेय ज्ञान को नित्य मानते हैं और विषय
एवं इन्द्रियादि सहकारियों के रहने और नहीं रहने से विषयसंवेदन के कादाचित्कत्व
(कभी होना कभी नहीं) का निर्वाह करते हैं, तो फिर विषयसंवेदन के कादाचित्कत्व
के प्रयोजक इन्द्रियादि रूप कारणों से ही विषयसंवेदन की उत्पत्ति मान लीजिए ।
इस तरह के ज्ञान की कल्पना ही व्यर्थ है जो विषयसंवेदन से अनुमेय हों