वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya
by महर्षि कणाद
Source: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (origin)
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१७२ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद
(च) और (सति) सुख वा दुःख के होते हुवे (कार्याऽदर्शनात्) सुख
वा दुःख का कार्य न देखने से [भी जाना जाता है कि सुख वा दुःख है] ॥
अर्थात् मुख से मुख प्रसन्न होता है, दुःख से मलिन होता है, जब सुख-
वर्त्तमान हो तब मुखमालिन्य नहीं देखा जाता और जब दुःख हो तब मुख
की प्रसन्नता नहीं दीख पड़ती ॥ ५ ॥
३६२-एकार्थसमवायिकारणान्तरेषु दृष्टत्वात् ॥ ६ ॥
(एकार्थसमवायिकारणान्तरेषु) एक पदार्थ में समवेत भिन्न २ कारणों
में (दृष्टत्वात्) देखा जाने से [सुख और दुःख भिन्न २ हैं] ॥
जिस को एक अर्थ कहते हैं, उस में भी अपेक्षाकृत फिर विशेषभेद होता
है, इस प्रकार सुख दुःख के एकार्थवर्त्ती भी अनेक कारण होते हैं, एक नहीं,
उन में से कोई सुख का और कोई दुःख का कारण हो जाते हैं ॥ ६ ॥
३६३-एकदेश इत्येकस्मिञ्छिरः पृष्ठमुदरं मर्माणि,
तद्विशेषस्तद्विशेषेभ्यः ॥ ७ ॥
(एकस्मिन्) एक शरीर में (शिरः, पृष्ठम्, उदरम्, मर्माणि) शिर,
कमर, पेट, मर्मस्थान (इति) ऐसा व्यवहार (एकदेशे) शरीर के अवयवों
में है। (तद्विशेषः) उन शिर आदि विशिष्ट कार्य्यों का विशेष (तद्विशेषेभ्यः)
उन के विशेष कारणों से होता है ॥ ७ ॥
इस आह्निक में अपने २ कारणों की विभिन्नता से सुख और दुःख का
परस्परभेद और ज्ञान से भेद कहा गया ॥
इति दशमाऽध्यायस्य
प्रथममाह्निकम्
॥ १॥
अथ द्वितीयमाह्निकम्
३६४-कारणमिति द्रव्ये, कार्य्यसमवायात् ॥ १ ॥
(कारणम्) कारण है, (इति) ऐसा व्यवहार वा प्रतीति (द्रव्ये) द्रव्य
में होती है, क्योंकि (कार्य्यसमवायात्) कार्य्यों का समवाय सम्बन्ध [द्रव्यों
में ही होता है] इस कारण से ॥
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