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वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya

by महर्षि कणाद

Source: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (origin)

DevanagariSanskritpublished160 pages

Page 133 of 160

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Page 133

ओ३म्
अथाष्टमोऽध्यायः
तत्र
प्रथममाह्निकम्
परत्व और अपरत्व की परीक्षा हो चुकी, आगे क्रमानुसार बुद्धि की
परीक्षा करनी है। प्रत्यक्षादि भेद से बुद्धियें बहुत हैं, ज्ञान भी बुद्धि ही का
नाम है, इस लिये प्रथम प्रत्यक्ष ज्ञान की परीक्षा का उपक्रम करते हैं—
३१२-द्रव्येषु ज्ञानं व्याख्यातम् ॥ १ ॥
(द्रव्येषु) पृथिव्यादि द्रव्यों के विषय में (ज्ञानम्) ज्ञान की (व्याख्यातम्)
व्याख्या होचुकी ॥
अध्याय ४ आह्निक १ सूत्र ६ में कहचुके हैं कि “महत्यनेकद्रव्यवत्त्वाद्
रूपाच्चोपलब्धिः” इस सूत्र में द्रव्यविषयक प्रत्यक्ष ज्ञान की व्याख्या की गई
थी, जिस को वहीं १६३ में देख लीजिये ॥ १ ॥ परन्तु-
३१३-तत्रात्मा मनश्चाप्रत्यक्षे ॥ २ ॥
(तत्र) उन पृथिव्यादि द्रव्यों में (आत्मा) जीवात्मा और परमात्मा
(च) और (मनः) मन (अप्रत्यक्षे) प्रत्यक्ष नहीं हैं ॥
प्रायः सभी टीकाकार इस सूत्र के (च) शब्द से वायु, आकाश, काल,
दिशा और परमाणुओं का ग्रहण करते हैं। तब इस सूत्र का यह अर्थ होता
है कि “उन में से आत्मा, मन, वायु, आकाश, काल, दिशा और परमाणु
प्रत्यक्ष नहीं हैं”, शेष पृथिवी जल अग्नि प्रत्यक्ष हैं ॥ २ ॥
प्रश्न-प्रत्यक्ष ज्ञान की विधि बतलाओ ? उत्तर-
३१४-ज्ञाननिर्देशे ज्ञाननिष्पत्तिविधिरुक्तः ॥ ३ ॥
(ज्ञाननिर्देशे) जहां ज्ञान का निर्देश किया है वहां (ज्ञाननिष्पत्तिविधिः)
ज्ञान प्राप्त होने की रीति (उक्तः) बतलाई जा चुकी है ॥
१३५ में इन्द्रियार्थसन्निकर्ष से प्रत्यक्ष ज्ञान की उत्पत्ति कह चुके हैं, वहीं
देख लीजिये ॥ ३ ॥
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