तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)
Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi
सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ३ तिरुक्कुरळ २७
३. सन्यासी का माहात्म्य
२१. सभी धर्म-ग्रन्थों का निश्चित मत है कि सदाचरण पर स्थिर रूप से
चलकर सन्यास ग्रहण करनेवालों की महिमा ही सर्वश्रेष्ठ है।
२२. सन्यासी के माहात्म्य की गणना करना ठीक वैसा ही है जैसे यह
गिनना कि इस संसार में आज तक कितने मृत्यु को प्राप्त हुए।
२३. जन्म तथा मुक्ति-इन दोनों के सुख-दुख को पूर्णतः समझकर भविष्य में
जन्म से मुक्ति प्राप्त करने के हेतु जो सन्यास ग्रहण करे, उसका
मान संसार में बढ़ेगा।
२४. दृढ़ता रूपी अंकुश के द्वारा पंचेन्द्रिय रूपी हस्तियों को जो वशीभूत
कर ले, वह सर्वोत्तम लोक के एक बीज के समान है।
२५ पंचेन्द्रियों पर विजय-प्राप्त व्यक्ति की शक्ति को व्यक्त करने के
सुन्दर उदाहरण विशाल आकाश के अधिपति इन्द्र स्वयं हैं।
२६. श्रेष्ठ कार्यों को सिद्ध करनेवाले व्यक्ति ही श्रेष्ठ हैं, और जो श्रेष्ठ
कार्यों में सिद्ध नहीं होते, वे निम्न हैं।
२७. वस्तुतः संसार उन्हीं के हाथों में है जो शब्द, स्पर्श, रूप, रस,
गन्ध के गुण के ज्ञाता हैं।
२८. सारगर्भित शब्दों से युक्त सन्यासी की महिमा को इस संसार में
धार्मिक वचन सिद्ध कर देंगे।
२९ सद्गुण रूपी शृंग पर खड़े हुए व्यक्ति का क्रोध क्षणमात्र के लिए भी
सहन नहीं किया जा सकता।
३०. ब्राह्मण कहलाने योग्य वही है जो धर्म-निरत रहकर सभी जीवों पर
सस्नेह दयार्द्र हो।