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तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)

तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)

Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi

सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा

DevanagariHindipublished334 पृष्ठ

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पृष्ठ 50

अध्याय- २ तिरुक्कुरळ 27
२. वर्षा वैशिष्ट्य
११. संसार का अस्तित्व वर्षा पर आधारित होने के कारण वही संसार की
सुधा कहलाने योग्य है ।
१२. जीवमात्र के लिए उपयुक्त भोज्य पदार्थों की सृष्टि करके वर्षा स्वयं भी
उनके लिए भोजन (जल) बन जाती है ।
१३. ऋतुकालीन वर्षा न हो तो महासागरों के मध्य उपस्थित इस
पृथ्वी के सभी जीवों को क्षुधा सदा सतायेगी ।
१४. वर्षा रूपी आय में यदि कमी पड़ी तो कृषक कृषि-कर्म नहीं करेंगे ।
१५. (न बरस कर) किसी व्यक्ति का नाश ही नहीं, अपितु (खूब बरस कर)
गिरे हुए व्यक्ति का विकास करने की शक्ति भी वर्षा में है ।
१६. वर्षा का जल-बिन्दु पड़े बिना, किसी स्थान पर हरित-तृण की
नोक के भी दर्शन दुर्लभ होते हैं ।
१७. यदि जलद अपने आपको क्षीण करके बरसना बन्द कर दे तो
असीम समुद्र भी सूख जायगा ।
१८. यदि वर्षा न हो तो संसार में सम्मान के साथ होनेवाली देव-पूजा
बन्द हो जायगी ।
१९. विस्तृत व्योम वर्षा-वृष्टि न करे तो इस विशाल वसुधा पर से दान
व तपस्या दोनों का सदा के लिए लोप हो जायगा ।
२०. जल के बिना संसार में जीवन का अन्त हो जायगा तो वर्षा के
बिना सदाचरण को भी सब में समाप्त ही समझो ।