तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)
Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi
सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतिरुक्कुरळ्
१. धर्म
१. प्रस्तावना
१. सर्वेश स्तुति
१. सभी अक्षर-मालाएँ 'अ' अक्षर को प्रथमतः धारण की हुई हैं।
सभी लोक 'आदि भगवान्' को ही प्रथमतः धारण किये हुए हैं।
२. विशुद्ध-ज्ञान रूप सर्वेश्वर के श्री चरणों की सेवा के बिना सारा
विद्यार्जन व्यर्थ ही है।
३. पुष्पों पर गमन करनेवाले (अथवा सभी के हृदय-कमल में
उपस्थित) उस सर्वेश के पदों के उपासक (आनन्द) भूमि पर सदा
दीर्घायुष्मान होंगे।
४. इच्छा व अनिच्छा से रिक्त सर्वेश की शरण जो ग्रहण करते हैं,
उन्हें किसी प्रकार का कष्ट बाधित नहीं कर सकता।
५. सर्वेश के सुयश का सदा सप्रेम गान करनेवाले अज्ञान से उत्पन्न,
उभय कर्मों से मुक्त रहेंगे।
६. पंचेन्द्रियों के उद्गारों को भस्मीभूत कर सर्वेश के सत्य-मार्ग के जो
निरन्तर अनुगामी होते हैं, उन्हें स्थायी सद्गति प्राप्त होती है।
७. उस अनुपम परम पुरुष के पदों में पहुँचे बिना मन की चिन्ता कभी
मिट नहीं सकती।
८. सदा शीतल व शान्त रहनेवाले उस धर्म-सिन्धु के चरणों की
वंदना नहीं की तो भव-सागर से बेड़ा पार होना नितान्त
असम्भव है।
९. अष्ट-गुणों से युक्त सर्वेश्वर के चरणों में जो शीश न झुके, उसे
बस, शक्तिहीन इन्द्रिय के समान ही समझो।
१०. वे ही संसार-सागर से तरेंगे जो ईश्वर के श्री चरणों में स्थिर
था तरना असम्भव ही है।
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