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स्वप्नदोष चिकित्सा

स्वप्नदोष चिकित्सा

Swapnadosh Chikitsa

by स्वामी ओमानन्द सरस्वती

Source: Brahmacharya Sangrah · वैदिक पुस्तकालय (origin)

DevanagariHindipublished14 pages

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( ४४४ )

स्वप्रदोष की चिकित्सा

फिर लौटकर शरीर में ऊपर को नहीं जाता और स्वप्रदोषादि के द्वारा बाहर निकल जाता है। इसी प्रकार वीर्य का कोष बार-बार भरता और खाली होता रहता है। वह वीर्य जो शरीर का राजा है जिसे शरीर का अङ्ग बनना था, जो २५ वर्ष की आयु से पहले कभी भी वा आयुभर शरीर से बाहर नहीं निकल सकता था तथा जो ऊर्ध्वगति होकर शरीर और मस्तिष्क की शक्ति का रूप धारण करता, आज इच्छा के विरुद्ध शरीर का सार अमृतरूपी वीर्य मूत्र के समान बुरी तरह टपक-टपककर निकल रहा ह। ऐसी अवस्था में बालक और युवक धाड़ मारकर रोते और चिल्लाते हैं।

उनके आंसू पोंछने के लिये यह ऊर्ध्वरेता होने का गुसरहस्य कर्तव्यभावना से लिख रहा हूँ। इसमें शुक्राशय (वीर्य के खजाने) में पड़ा हुआ वीर्य फिर ऊपर को जाने लगेगा, जैसे कि दीपक का तैल जाता है। यह ऋषियों की गुप्तविद्या है। जो आज लाखों रुपये खर्च करने पर नहीं मिलती। कितने ही ब्रह्मचर्य के दीवाने इसकी खोज करने में रात दिन एक कर देते हैं, भयङ्कर से भयङ्कर पर्वतों की गुफाओं और कन्दराओं को छान मारते हैं तब जाकर इसका भेद मिलता है। इसलिये इसको पढ़कर व्यर्थ न समझ लेना, इसका श्रद्धापूर्वक अभ्यास करो। इससे स्वप्रदोषादि रोगों से अवश्य ही पिण्ड छूट जायेगा और वीर्यरक्षा में सफल होजावोगे।

२. प्राणायामविधि

पहले सिद्ध आसन से बैठजाओ। उसकी विधि इस प्रकार है। बायें पैर की एड़ी अण्डकोष और गुदा इन्द्रिय के बीच में जो स्थान है उस पर लगाओ। यह वह स्थान है जहां से वीर्यवाहक नाड़ियां जाती हैं। इन ही में से गुजरकर वीर्य बाहर निकल जाता है। इसलिए पैर की एड़ी को इन नाड़ियों पर दबाकर लगाना चाहिये। दायें पैर की एड़ी मूत्र इन्द्रिय के ऊपर जहां बाल उगते हैं, लगाओ। दोनों पैरों के गट्टे मिले हुए हों। दोनों पैरों के घुटने भूमि पर लगे हुए हों। शिर ग्रीवा (गर्दन), मेरुदण्ड (रीढ़ की हड्डी) सब समरेखा में (सीधी) रहनी चाहिए। एक कपड़े की छोटी गद्दी बनाकर गुदा के नीचे रखलो। जिससे वीर्यवाहक नाड़ियों पर अधिक बल (जोर) पड़े। दोनों हाथों को तानकर दोनों घुटनों पर रखो। शरीर सारा खिंचा हुआ होना चाहिये। छाती तनी हुई तथा आगे को उभरी हुई हो। ठोडी का झुकाव थोड़ासा छाती की ओर हो। केवल लंगोट लगाकर आसन में बैठो तो अच्छा रहेगा। यदि केवलमात्र इस सिद्धासन का ही अभ्यास किया जाये तो यह भी वीर्यरक्षार्थ तथा स्वप्रदोष को दूर करने में अत्यन्त हितकर है।

प्राणायाम करने से पूर्व यदि बायां स्वर चलता हो तो अच्छा है। जिधर से वायु आता हो उधर मुख रखो। जैसे अत्यन्त वेग से वमन (कै) होता है और अन्न जल बाहर निकल जाता है, वैसे ही प्राण (श्वास) को बल से बाहर फेंकदो। एक ही बार, निरन्तर एक श्वास में, सारी वायु बाहर निकल जाय। झटके दे देकर नहीं।