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स्वप्नदोष चिकित्सा

स्वप्नदोष चिकित्सा

Swapnadosh Chikitsa

by स्वामी ओमानन्द सरस्वती

Source: Brahmacharya Sangrah · वैदिक पुस्तकालय (origin)

DevanagariHindipublished14 pages

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प्राणायामविधि

( ४४५ )

श्वास निकलने से पूर्व नाभि के नीचे से मूल इन्द्रिय का ऊपर संकोच करो (खींचो)। पहिले हृदय का वायु बल से बाहर निकालो। फिर ऊपर के फेफड़े का श्वास निकालकर खाली करना चाहिये। फिर उदर (पेट) को खाली करना। किन्तु ध्यान रखो—सारा प्राण एक श्वास में ही बाहर निकलजाये। श्वास तोड़-तोड़कर कभी न निकालो। श्वास को लम्बा करके तथा निरन्तर गति देते हुए एक ही बार बाहर निकालदो। जब श्वास सारा हृदय, फेफड़ों और उदरादि का बाहर निकलजाये तो उदर (पेट) को अन्दर की ओर खींचे रहो। श्वास को यथाशक्ति बाहर ही रोको। जब घबराहट जो तब धीरे-धीरे भीतर वायु को लेलो। किन्तु अन्दर नहीं रोको। यह एक प्राणायाम हुआ।

फिर उसी प्रकार दूसरा प्राणायाम, फिर बाहर निकालकर बाहर ही रोककर करो। इसी प्रकार तीन प्राणायाम करो। अन्दर नहीं रोको। पहिले बाह्यकुम्भक (बाहर रोकने) का ही अभ्यास करो। बाह्यविषय वा बाह्यकुम्भक का अभ्यास कम से कम एक वर्ष तक करना चाहिये। यही पहला प्राणायाम है। जब तक यह सिद्ध न होजाय तब तक दूसरा प्राणायाम (आभ्यन्तर) जो अन्दर रोकने का है (इसे आभ्यन्तर कुम्भक कहते हैं नहीं करना चाहिये। लोग अन्दर और बाहर रोकना दोनों एक साथ आरम्भ करदेते हैं। इसलिए लाभ तथा उन्नति नहीं होती। जब पहिले प्राणायाम में सफलता मिलजाये तब दूसरे का अभ्यास करना चाहिये। एक मास तक तीन प्राणायाम प्रातःकाल करो और तीन प्राणायाम सायंकाल करो। फिर शनैः-शनैः प्रतिमास संख्या बढ़ातेजाओ। यदि गोदुग्ध, घृत वा अन्य पौष्टिकभोजन पर्याप्त खाने को मिले तो दोनों समय अभ्यास करना चाहिये और संख्या बढ़ाते-बढ़ाते इक्कीस (२१) प्राणायाम तक करसकते हैं। पौष्टिकभोजन का अभाव (कमी) हो तो धीरे-धीरे संख्या बढ़ाओ। कभी शक्ति से अधिक न करो, न ही नाक पकड़कर अधिक देर बलात् (जबरदस्ती) रोकने का यत्न करो। इस प्राणायाम में आरम्भ से लेकर अन्त तक एक विशेषक्रिया का ध्यान रखना तथा अभ्यास करना है। श्वास निकलने से पूर्व नाभि के नीचे जो मूलाधार को खींचा था, उसे खींचे ही रखना है। ढीला नहीं छोड़ना और इसे खींचे रखने का तो अभ्यास करना है। जितनी देर वा जितने भी प्राणायाम करो मूलाधार को खींचे ही रखना। पहिले-पहिले कुछ कठिनाई वा कष्ट प्रतीत होगा, किन्तु कुछ दिन के अभ्यास से ठीक हो जावेगा। मूलाधार खींचते समय मन से नाभि के नीचे ध्यान करें कि हम अपने वीर्य को ऊपर खींच रहे हैं। सारे प्राणायाम में यह ही ध्यान करते रहो।

कुछ दिन के अभ्यास से वीर्य ऊपर को यथार्थ में खिंचने तथा जाने लगेगा और जब आप निरन्तर अभ्यास करते-करते इक्कीस (२१) प्राणायाम तक पहुंच जायेंगे तो वीर्य की गति पूर्णतया ऊर्ध्व होजायेगी। वीर्य ऊपर को मस्तिष्क की ओर बहने लगेगा। आप ऊर्ध्वरैता होजायेंगे। आपका वीर्यकोष खाली होजायेगा और