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स्वरोदय विज्ञान

स्वरोदय विज्ञान

Swarodaya Vigyan

by श्री स्वामी जी महाराज (पीताम्बरा पीठाधीश्वर)

Source: स्वरोदय विज्ञानं - पीताम्बरा पीठाधीश्वर · पीताम्बरा पीठ (origin)

Devanagarihipublished94 pages

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(स्वरोदय विज्ञान)

अर्थात् यह 'गुरु से ही सीखे जाने योग्य है शास्त्र से नहीं।' विपरीत करणी मुद्रा के अतिरिक्त खेचरी मुद्रा द्वारा भी सहज ही उस अमृत की रक्षा की जा सकती है। खेचरी मुद्रा का नियम इस प्रकार है —

रसनां तालुमध्ये तु शनैः शनैः प्रवेशयेत्।

कपालकुहरे जिह्वा प्रविष्टा विपरीतगा॥

भ्रवोर्मध्ये गता दृष्टिर्मुदा भवति खेचरी॥

(घेरण्ड संहिता)

जीभ को धीरे धीरे तालु के अन्दर प्रवेश कराना चाहिए। उसके बाद जीभ को ऊपर की ओर उलट कर कपाल कुहर में प्रवेश करा कर दोनों भौहों के बीच में दृष्टि स्थिर करने पर खेचरी मुद्रा होती है।

कोई कोई तालुमूल में जीभ का अग्र-भाग स्पर्श करा कर ऊस्तादी करते हैं। पर बस वही तक, वास्तविक कुछ नहीं होता। इस प्रकार जीभ रखकर क्या किया जाता है इस बात को कोई नहीं जानता। खेचरी मुद्रा द्वारा ब्रह्मरन्ध्र से निकलने वाली सोमधारा का पान करने से अभूतपूर्व नशा होता है। सिर घूमता है। नेत्र स्वयं अधमुंदे और स्थिर रहते हैं; भूख प्यास जाती रहती है; तब खेचरी मुद्रा सिद्ध होती है। खेचरी मुद्रा के साधन द्वारा ब्रह्मरन्ध्र से जो सुधा झरती है वह साधक के सारे शरीर को प्लावित करती है। इससे साधक दृढ़काय, शिथिलता जरा इत्यादि से रहित, कामदेव के समान सुन्दर तथा पराक्रमशाली हो जाता है। वास्तविक खेचरी मुद्रा का साधन करने से साधक छह महीने में सब रोगों से मुक्त हो जाता है।

खेचरी मुद्रा सिद्ध होने पर नाना प्रकार के रसों का स्वाद मिलता है। स्वाद विशेष का फल अलग अलग होता है। दूध का स्वाद मालूम होने पर अमरत्व प्राप्त होता है।

और भी अनेक उपाय हैं जिनसे शिथिलता, जरा आदि से रहित होकर यौवन चिरस्थायी बनाया जा सकता है।