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स्वरोदय विज्ञान

स्वरोदय विज्ञान

Swarodaya Vigyan

by श्री स्वामी जी महाराज (पीताम्बरा पीठाधीश्वर)

Source: स्वरोदय विज्ञानं - पीताम्बरा पीठाधीश्वर · पीताम्बरा पीठ (origin)

Devanagarihipublished94 pages

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(स्वरोदय विज्ञान)

पार्वत्यवाच

बोली गौरि जोरि कर दोऊ, पूरन क्रिया कहौ सिव सोऊ।

अथ पूरक-कर्म

श्रीशिव उवाच

बोले सिव जो पूरन गहै, हलकौ तनहि बूल सम लहै।
जैसे तूलहि पवन उड़ावै, त्यौ साधक जल में चलि आवै।
जो कोउ चाहै पुरक साधै, आसन तहां पालथी बांधै।
पूरक करै पवन को खैचै, उदर हलाइ सु अंतर ऐंचै।
नासा स्वर को खैचत रहै, जब लगी पवन सकल तन बहै।
एक वर्ष यह साधन करै, सिद्धि होइ सो जल में तरै।
तन की व्याधि सकल पुनि नासै, बहु आनंद हिय माहि प्रकासै।

इति पूरक-कर्म

पार्वत्युवाच

तवै सिवा सिव सौ प्रति कहियै, कर्म खेचरी किहि विधि लहियै।

अथ खेचरी-कर्म

श्रीशिव उवाच

बोले सिव सो पवनहि थंभै, कर्म खेचरी जो आरम्भै।
तालु रध जीभ सौ मूदैं, वायुन निकसै, तन में कूदैं।
सौधा नौन जगत विख्याता, काली मिरच मिलावै गाता।
जिभ्यासौ षट मास लगावै, सांझा भोर नहि सो बिसरावै।
दोह कर जिभ्या दोहन करै, चिंता कछु न चित में धरै।
भीजे बसन दुहै पुनि ताको, बाहिर मुखते खैचै बाको।
कोमल होइ जीभ पुनि बाढ़े, जौं जौं साधक खैचत गादैं।