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स्वरोदय विज्ञान

स्वरोदय विज्ञान

Swarodaya Vigyan

by श्री स्वामी जी महाराज (पीताम्बरा पीठाधीश्वर)

Source: स्वरोदय विज्ञानं - पीताम्बरा पीठाधीश्वर · पीताम्बरा पीठ (origin)

Devanagarihipublished94 pages

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विज्ञान)

(स्वरोदय विज्ञान)

(३६)

र करै,
कै कछु
न पर
चलत

इन्द्र-स्वरोदय

अथ चन्द्र-स्वरोदय लिख्यते -

गुप्तजातिगुप्ततरं सारं मप्रकाशिप्रकाशितम्।

इन्द्र स्वरोदय ज्ञानं ज्ञानिना मस्तके स्थितम्॥

अर्थ- गुपित विचार है प्रकास, बताइ वे कौ नहीं। प्रकासि वतु है यह सुरोदया की ज्ञानु है।

दुष्टैव दुर्जनं छुद्रतुः शान्ते गुरुतलपके।

हीन संते दुराचारेसु ज्ञाने न दीयते॥

दुष्ट, छुद्र, दुर्जन, क्रोधी, गुणहीन, आचारहीन ए लछिन होंहि ताहि न दीजै।

शान्ति सुझे सदाचारे गुरभक्तैकमानसे।

दृढ़ चिते कृतंगे च देवचैव सुरोदय॥

सात, सुथ्य, आचारी, गुरु भक्त, एकंत चित, दृढ़ विसवासी, करे कौ मानै ताहि सुरोदया दीजै।

सुर- हीन सिर-हीन देही, नाथ हीन गृह, शास्त्र-हीन वक्ता; ऐसे सकल सहस्रन कौ ज्ञान है। सुर ग्यान बिना नाभ के ठिकानै ताहां तै सकल नाडी उपजती है। अहोरात्रि के मध्य स्वासा २१६०० तिन की नाडी ७२०००। तिन विषै दस बोय है, दस अर्य है, दो दो तरीछी है। ऐसी नाडी २४ श्रोष्ठ है। तिन विषै तिन दस श्रोष्ठ है। तिन विषै तिन की ब्रह्म मारग की खबर है।

इक इडा है वाम नाडी चन्द्रमा की। दूसरी पिंगला है सूरज नाडी दाहिनी। तीसरी सुरसुती सुषमना है। अग्नि की नाडी छिन बारीं छिन दाहिनी।

बदल
नासु
करै।
रे तो
देइ।

काश
जल
इजै।
गजर
गजर
की