स्वरोदय विज्ञान
Swarodaya Vigyan
by श्री स्वामी जी महाराज (पीताम्बरा पीठाधीश्वर)
Source: स्वरोदय विज्ञानं - पीताम्बरा पीठाधीश्वर · पीताम्बरा पीठ (origin)
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(स्वरोदय विज्ञान)
॥ श्री गणेशायनमः ॥
स्वरोदय
अथ स्वरोदय लिख्यते -
सतगुरु ने कृपा करी जाप बतायो जाप।
निसवासर तासे लगै, छोड़ न छिन्ताई॥
सुर दाता सब बात कौ मालिक और न कोई।
उदै अस्त लखिवै करै, अटल अमर यह होई॥
तब सुर को विचारन लगै। रोज पानी से गैल सीवन लगै। हमेसा अलोप रहे। चारि दिन डेरे स्वर के हैं। बुध, बृहस्पति, शुक्र और सोमवार ये चार दिन चन्द्र स्वर के हैं। इनके उदै में डेरी सुर चलत है। सब काहू को चारि वरन मैं। और कोहू बचै नहीं है। भली-बुरी सब ही पर बीति जाति है। काहू को खबर नाहि परति है।
ईश्वर मानस से कहत है। मनुष्य की देही सब औतारन से बड़ी है। सो कोई स्वास घटाई जानत है और साधत है। राजा होई कै स्वर की मरजाद बाँधत है। तौ सूरज का सात पुतेज होई। तब कोई कुछ माँगै चाहे तो ततीछन फल पावै। परजा सुखी सब देस में रोग जन-मन आवै। महा गौन होई और पृथ्वी पर सकल आनन्द रहै। संसार की उपज खिपज जाती जाइ। ऐसे राजा होई और जो साधंगी होई। तो दसौं दिसा के दरसन होई। सब देवतन का दरबार करै। और जे संसार में बीजक बातै हैं। वे सब जानै और बहुत काल जीवै। सब धर्म को जाने। जुगति को जाने, मुक्ति को देखै। ये लछिन योगी जीतै।
और भोगी साथै तो इतने फल पावै। प्रथम पुत्र लाभ होई, सम्पत्ति