श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगीताकी बहिरंगपरीक्षा ५१९
४. ३१ नायं लोकोऽस्त्ययज्ञस्य ० शांति. ( २६७. ४० ) ; गोकापिली-
श्लोकार्ध । याख्यानमें पाया जाता है, और सब
प्रकरण यज्ञविषयकही है ।
४. ४० नायं लोकोऽस्ति न परो० वन. ( १९९. ११० ) ; मार्कण्डेय समस्या-
श्लोकार्ध । पर्वमें शब्दशः मिलता है ।
५. ५ यत्सांख्यैः प्राप्यते स्थानं० श्लोक । शांति. ( ३०५; १९; ३१६. ४ ) ; इन
दोनों स्थानोंमें कुछ पाठभेदसे
वसिष्ठकराल औरयाज्ञवल्क्य-जन-
कके संवादमें पाया जाता है ।
५. १८ विद्याविनयसंपन्ने० श्लोक । शांति. ( २३८. १९ ) ; शुकानुप्रश्नमें
अक्षरशः मिलता है ।
६. ५ आत्मैव ह्यात्मनो बंधु० श्लोकार्ध । उद्योग. ( ३३. ६३, ६४ ) ; विदुर-
और आगामी श्लोकका अर्ध । नीतिमें ठीक ठीक मिलता है ।
६. २९ सर्वभूतस्थमात्मानं० श्लोकार्ध । शांति. ( २३८. २१ ) ; शुकानुप्रश्न, मनु-
स्मृति ( १२. ९१ ), ईशावास्योप-
निषद् ( ६ ) और कैवल्योपनिषदमें
( १. १० ) तो ज्यों-का-ज्यों मिलता
है।
६. ४४ जिज्ञासुरपि योगस्य० श्लोकार्ध । शांति. ( २३५. ७ ) ; शुकानुप्रश्नमें कुछ
पाठ-भेद करके रखा गया है ।
८. १७ सहस्रयुगपर्यंतं० यह श्लोक पहले शांति. ( २३१. ३१ ) ; शुकानुप्रश्नम
युगका अर्थ न बतलाकर गीतामें अक्षरशः मिलता है; और युगका अर्थ
दिया गया है । बतलानेवाला कोष्टकभी पहले दिया
गया है । मनुस्मृतिमेंभी कुछ पाठां-
तरसे मिलता है ( मनु. १. ७३ ) ।
८. २० यः स सर्वेषु भूतेषु श्लोकार्ध । शांति. ( ३३९. २३ ) ; नारायणीय
धर्ममें कुछ पाठांतर होकर दो बार
आया है ।
९. ३२ स्त्रियो वैश्यास्तथा० यह पूरा अश्व. ( १९. ६१, ६२ ) ; अनुगीतामें
श्लोक और आगामी श्लोकका कुछ पाठांतरके साथ येही श्लोक हैं ।
पूर्वार्ध ।