श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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उपसंहार ५०९
समानो व आकूतिः समाना हृदयानि वः ।
समानमस्तु वो मनो यथा वः सुसहासति ॥
यथा वः सुसहासति ॥*
- यह मंत्र ऋग्वेद संहिताके अंतमे आया है। यज्ञमंडपमें एकत्रित लोगोंको
लक्ष्य करके यह कहा गया है। अर्थ - "तुम्हारा अभिप्राय एक समान हो, तुम्हारे
अतःकरण एक समान हों; और तुम्हारा मन एक समान हो, जिससे तुम्हारा सुसाह्य
होगा; अर्थात् संघ-शक्तिकी दृढ़ता होगी।" असति = अस्ति, यह वैदिक रूप है।
"यथा वः सुसहासति" इसकी द्विरुक्ति ग्रंथकी समाप्ति दिखलानेके लिये की गई है।
॥ ॐ तत्सत् ब्रह्मार्पणमस्तु ॥