श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसंन्यास और कर्मयोग ३५५
( ३ ) इसलिये इंद्रियोंके विषयोंका ( ३ ) इसलिये इंद्रियोंके विषयोंको
पाश तोड़ मुक्त ( स्वतंत्र ) हो जाओ । न छोड़ कर उन्हींमें वैराग्यसे अर्थात्
निष्काम बुद्धिसे व्यवहार कर इंद्रिय-
निग्रह की जाँच करो । निष्कामके माने
निष्क्रिय नहीं ।
( ४ ) तृष्णा मूलक कर्म दुःखमय ( ४ ) यदि इसका भली भाँति विचार
और बंधक हैं । करें, कि दुःख और बंधन किसमें हैं, तो
दीख पड़ेगा, कि अचेतन-कर्म किसीकोभी
बाँधते या छोड़ते नहीं हैं । उनके संबंधमें
कर्ताके मनमें जो काम या फलाशा होती
है, वही बंधन और दुःखकी जड़ है ।
( ५ ) इसलिये चित्तशुद्धि होनेतक ( ५ ) इसलिये चित्तशुद्धि हो चुकने
यदि कोई कर्म करे, तोभी अंतमें छोड़ परभी फलाशा छोड़ कर धैर्य और
देने चाहिये । उत्साहके साथ सब कर्म करते रहो ।
यदि कहो, कि कर्मोंको छोड़ दें; तो वे
छूट नहीं सकते । सृष्टिही तो एक कर्म
है; उसे विश्राम हैही नहीं ।
( ६ ) यज्ञके अर्थ किये गये कर्म ( ६ ) निष्कामबुद्धिसे या ब्रह्मार्पण-
बंधक न होनेके कारण गृहस्थाश्रममें विधिसे किये गये समस्त कर्म एक बड़ा
उनके करनेसे हानि नहीं है । भारी 'यज्ञ' ही है । इसलिये स्वधर्मविहित
समस्त कर्मोंको निष्काम बुद्धिसे केवल
कर्तव्य समझ कर सदैव करते रहना
चाहिये ।
( ७ ) देहके धर्म कभी छूटते नहीं, ( ७ ) पेटके लिये भीख माँगनाभी
इस कारण संन्यास लेनेपर पेटके लिये तो कर्मही है; और सोभी लज्जाप्रद यदि
भिक्षा माँगना बुरा नहीं । ऐसा कर्म करनाही है, तब अन्यान्य कर्मभी
निष्काम बुद्धिसे क्यों न किये जावें ?
गृहस्थाश्रमीके अतिरिक्त भिक्षा देगाही
कौन ?