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श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

by लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक

DevanagariHindipublished956 pages

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चाहिये। इस प्रकार लँगड़े और अंधेकी वह जोड़ी है और जैसे अंधेके कंधेपर लँगड़ा
बैठे; और वे दोनों एक दूसरेकी सहायतासे मार्ग चलने लगें; वैसेही अचेतन प्रकृति
और सचेतन पुरुषका संयोग हो जानेपर सृष्टिके सब कार्य आरंभ हो जाते हैं (सां.
का. २१)। और जिस प्रकार नाटककी रंगभूमिपर प्रेक्षकोंके मनोरंजनार्थ एकही
नटी कभी एक तो कभी दूसराही स्वाँग बनाकर नाचती रहती है, उसी प्रकार
पुरुषके लाभके लिये (पुरुषार्थके लिये), यद्यपि पुरुष कुछभी पारितोषिक नहीं देता;
तोभी यह प्रकृति सत्त्व-रज-तम गुणोंकी न्यूनाधिकतासे अनेक रूप धारण करके उसके
सामने लगातार नाचती रहती है (सां. का. ५९)। प्रकृतिके इस नाचको देखकर -
मोहसे भूल जानेके कारण, या वृथाभिमानके कारण - जबतक पुरुष इस प्रकृतिके
कर्तृत्वको स्वयं अपनाही कर्तृत्व मानता रहता है; और जबतक वह सुखदुःखके
पाशमें स्वयं अपनेको फँसा रखता है, तबतक उसे मोक्ष या मुक्तिकी प्राप्ति
कभी नहीं हो सकती (गीता ३. २७)। परंतु जिस समय पुरुषको यह ज्ञान हो
जाय, कि त्रिगुणात्मक प्रकृति भिन्न है और मैं भिन्न हूँ; उस समय वह मुक्तही है
(गीता १३. २९, ३०; १४. २०)। क्योंकि, यथार्थमें पुरुष न तो कर्ता है और न
बँधाही है। वह स्वतंत्र है और निसर्गतः केवल अर्थात् अकर्ता है। जो कुछ होता
है वह सब प्रकृतिहीका खेल है। यहाँतक कि मन और बुद्धिभी प्रकृतिहीकेही
विकार हैं। इसलिये बुद्धिको जो ज्ञान होता है, वहभी प्रकृतिके कार्यकाही फल
है। यह ज्ञान तीन प्रकारका होता है; जैसे: सात्त्विक, राजस और तामस
(गीता १८. २०-२२)। जब बुद्धिको सात्त्विक ज्ञान प्राप्त होता है, तब पुरुषको
यह मालूम होने लगता है, कि मैं प्रकृतिसे भिन्न हूँ। सत्त्व-रज-तमोगुण प्रकृतिहीकेही
धर्म हैं; पुरुषके नहीं। पुरुष निर्गुण है; और त्रिगुणात्मक प्रकृति उसका दर्पण
है (मभा. शां. २०४. ८) जब यह दर्पण स्वच्छ या निर्मल हो जाता है अर्थात्
जब बुद्धि - जो प्रकृतिका विकार है - सात्त्विक हो जाती है, तब इस निर्मल दर्पणमें
पुरुषको अपना सात्त्विक या सच्चा स्वरूप दीखने लगता है; और उसे यह बोध हो
जाता है, कि मैं प्रकृतिसे भिन्न हूँ। उस समय यह प्रकृति लज्जित हो कर उस
पुरुषके सामने नाचना, खेलना या जाल फैलाना बंद कर देती है। जब यह अवस्था
प्राप्त हो जाती है, तब पुरुष सब पाशों या जालोंसे मुक्त हो कर अपने स्वाभाविक
कैवल्यपदको पहुँच जाता है। 'कैवल्य' शब्दका अर्थ है केवलता, अकेलापन, या
प्रकृतिके साथ संयोग न होना। पुरुषकी इस नैसर्गिक या स्वाभाविक स्थितिकोही
सांख्यशास्त्रमें मोक्ष (मुक्ति या छुटकारा) कहते हैं। इस अवस्थाके विषयमें
सांख्यवादियोंने एक बहुतही नाजुक प्रश्नका विचार उपस्थित किया है। उनका
प्रश्न है, कि पुरुष प्रकृतिको छोड़ देता है, या प्रकृति पुरुषको छोड़ देती है? कुछ
लोगोंकी समझमें यह प्रश्न वैसेही निरर्थक प्रतीत होगा, जैसे यह प्रश्न कि दुल्हेके
लिये दुल्हन लंबी है या दुल्हनके लिये दुल्हा ठिंगना है। क्योंकि जब दो वस्तु-