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श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

by लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक

DevanagariHindipublished956 pages

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Page 211

१६४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र
और, यदि ईश्वरको निर्गुण मानें, तो सत्कार्यवादानुसार निर्गुण मूलतत्त्वसे त्रिगुणा-
त्मक प्रकृति कभी उत्पन्न नहीं हो सकती। इसलिये, उन्होंने यह निश्चित सिद्धान्त
किया है, कि प्रकृति और पुरुषको छोड़ कर इस सृष्टिका और कोई तीसरा मूल
कारण नहीं है। इस प्रकार जब उन लोगोंने दोही मूल तत्त्व निश्चित कर लिये,
तब उन्होंने अपने मतके अनुसार इस बातकोभी सिद्ध कर दिया है, कि इन दोनों
मूलतत्त्वोंसे सृष्टि कैसे उत्पन्न हुई है। वे कहते हैं, कि यद्यपि निर्गुण पुरुष स्वयं कुछभी
कर नहीं सकता, तथापि जब प्रकृतिके साथ उसका संयोग होता है, तब जिस
प्रकार गाय अपने बछड़ेके लिये दूध देती है, या लोहचुंबकके पास होनेसे लोहमें
आकर्षण शक्ति उत्पन्न हो जाती है, उसी प्रकार मूल अव्यक्त प्रकृति अपने गुणों
( सूक्ष्म और स्थूल ) का व्यक्त फैलाव पुरुषके सामने फैलाने लगती है ( सां. का.
५७)। यद्यपि पुरुष सचेतन और ज्ञाता है, तथापि केवल अर्थात् निर्गुण होनेके कारण
स्वयं कर्म करनेके कोई साधन उसके पास नहीं हैं; और प्रकृति यद्यपि काम करने-
वाली है, तथापि जड़ या अचेतन होनेके कारण वह नही जानती, कि क्या करना
परंतु कोलब्रुक और विल्सनके अनुवादके साथ बंबईमें श्रीयुत तुकाराम तात्याने
जो पुस्तक मुद्रित की है, उसमें मूल विषयपर केवल ६९ आर्याएँ हैं। इसलिये
विल्सन साहबने अपने अनुवादमें यह संदेह प्रकट किया है, कि ७० वीं आर्या
कौनसी है। परंतु वह आर्या उनको नहीं मिली; और उनकी शंकाका समाधान नहीं
हुआ। हमारा मत है, कि वह वर्तमान ६१ वीं आर्याके आगे होगी। कारण यह
है, कि ६१ वीं आर्यापर गौडपादाचार्यका जो भाष्य है, वह कुछ एकही आर्यापर
नहीं है; किंतु दो आर्याओपर है और यदि इस भाष्यके प्रतीक पदोंको लेकर आर्या
बनाई जाय तो वह इस प्रकार होगी :-
कारणमीश्वरमेके ब्रुवते कालं परे स्वभावं वा ।
प्रजाः कथं निर्गुणतो व्यक्तः कालः स्वभावश्च ॥
यह आर्या पिछले और अगले संदर्भ ( अर्थ या भाव ) के अनुसारभी है। इस
आर्यामें निरीश्वरमतका प्रतिपादन है, इसलिये जान पड़ता है, कि किसीने इसे
पीछेसे निकाल डाला होगा। परंतु इस आर्याका शोधन करनेवाला मनुष्य इसका
भाष्यभी निकाल डालना भूल गया। इसलिये अब हम इस आर्याका ठीक ठीक पता
लगा सकते हैं; और इसीसे उस मनुष्यको धन्यवादही देना चाहिये। श्वेताश्वेत-
रोपनिषद्के छठे अध्यायके पहले मंत्रमें प्रकट होता है, कि प्राचीन समयमें कुछ
लोग स्वभाव और कालको - और वेदान्ती तो उसकेभी आगे बढ़कर ईश्वरको -
जगत्का मूलकारण मानते थे। वह मंत्र यह है :-
स्वभावमेके कवयो वदन्ति कालं तथान्ये परिमुह्यमानाः ।
देवस्यैषः महिमा तु लोके येनेदं भ्राम्यते ब्रह्मचक्रम् ॥
परंतु ईश्वरकृष्णने उपर्युक्त आर्याको वर्तमान ६१ वीं आर्याके बाद सिर्फ़
यह बतलानेके लिये रखा है, कि तीनों मूलकारण (अर्थात् स्वभाव, काल और
ईश्वर) सांख्यवादियोंको मान्य नहीं हैं!