श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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धन्यवाद दे देनेसेही नहीं हो जाता; हृदय जानता है; कि मैं आपका कैसा ऋणी हूँ ।
हिं. चि. ज. के संपादक श्रीयुत भास्कर रामचंद्र भालेरावने तथा औरभी अनेक
मित्रोंने समय-समयपर यथाशक्ति सहायता की है । अतः इन सब महाशयोंको मैं
आंतरिक धन्यवाद देता हूँ ।
एक वर्षसे अधिक समयतक इस ग्रंथके साथ मेरा अहोरात्र सहवास रहा है ।
सोते-जागते इसी ग्रंथके विचारोंकी मधुर कल्पनाएँ नजरोंमें झूलती रही हैं । इन
विचारोंसे मुझे मानसिक तथा आत्मिक अपार लाभ हुआ है । अतः जगदीश्वरसे
यही विनय है, कि इस ग्रंथके पढ़नेवालोंकोभी इससे लाभान्वित होनेका मंगलमय
आशीर्वाद दीजिये ।
श्रीरामदासी मठ, रायपुर (सी. पी.)
देवशयनी ११, मंगलवार, माधवराव सप्रे
संवत् १९७३ वि.