श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
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६४४ श्रीरामकृष्णवचनामृत २१ सितम्बर, १८८४
भी दो-तीन भक्त हैं। महेन्द्र कुछ आगे बढ़कर छोड़ आयेंगे। श्रीरामकृष्ण आनन्दपूर्वक श्रीगौरांग पर रचा गया एक गाना गा रहे हैं। साथ साथ मणि भी गा रहे हैं।
महेन्द्र तीर्थ जायेंगे। श्रीरामकृष्ण से उसी सम्बन्ध की बातें कर रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण – (महेन्द्र से सहास्य) – प्रेम के अंकुर के बिना उगते ही जाओगे, सब सूख न जायेगा?
"परन्तु जल्दी आना। अहा, बहुत दिनों से तुम्हारे यहाँ आने की इच्छा हो रही थी। एक बार देख लिया, अच्छा हुआ।"
महेन्द्र – जी, हम लोगों का जन्म और जीवन सार्थक हो गया।
श्रीरामकृष्ण – सार्थक तो तुम हो ही। तुम्हारे पिता भी अच्छे हैं। उस दिन देखा, अध्यात्म रामायण पर विश्वास है।
महेन्द्र – जी, कृपा रखियेगा, जिससे भक्ति हो।
श्रीरामकृष्ण – तुम बड़े उदार और सरल हो। उदार हुए बिना कोई ईश्वर को पा नहीं सकता। वे कपट से बहुत दूर हैं।
महेन्द्र श्यामबाजार के पास बिदा हुए। गाड़ी जा रही है।
श्रीरामकृष्ण – (मास्टर से) – यदु मल्लिक ने क्या किया?
मास्टर – (मन ही मन) – श्रीरामकृष्ण सब की कल्याण-कामना कर रहे हैं।
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