श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'
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Read in context१९ सितम्बर, १८८४
परिच्छेद ११
६२९
“कभी कभी मैं कुत्ते पर चढ़कर उसे पूड़ियाँ खिलाता और उसकी जूठी पूड़ियाँ खुद खाता था। सर्वं विष्णुमयं जगत्।
“अविद्या का नाश बिना किये न होगा। इसलिए मैं बाघ बन जाता था और अविद्या को खा जाता था।
“वेदमत से साधना करते समय संन्यास लिया। उस समय चाँदनी में पड़ा रहता था। हृदय से कहता था, मैंने संन्यास लिया है, मेरे लिए चाँदनी में खाने को दे जाया करो।
(भक्तों से) “धरना दिया था। पड़ा हुआ मैं माँ से कहता था – मैं मूर्ख हूँ, तुम मुझे बतला दो, वेदों, पुराणों, तन्त्रों और शास्त्रों में क्या हैं।
“माँ ने कहा, 'वेदान्त का सार है ब्रह्म, उसी को सत्य और संसार को मिथ्या माना है। जिस सच्चिदानन्द ब्रह्म की बात वेदों में है, उन्हें तन्त्रों में ‘सच्चिदानन्दः शिवः’ कहते हैं। और पुराणों में उन्हें ही ‘सच्चिदानन्दः कृष्णः’ कहते हैं।
“दस बार गीता का उच्चारण करने पर जो कुछ होता है, वही गीता का सार है। अर्थात् त्यागी – त्यागी।
“उन्हें जब कोई प्राप्त कर लेता है, तब वेद, वेदान्त, पुराण, तन्त्र सब इतने नीचे पड़े रहते हैं कि कुछ कहना ही नहीं। (हाजरा से) ॐ का भी उच्चारण नहीं किया जा सकता; समाधि से जब मैं बहुत नीचे उतर आता हूँ, तब कहीं जरूर ॐ का उच्चारण कर सकता हूँ।
“प्रत्यक्ष दर्शन के पश्चात् जो-जो अवस्थाएँ शास्त्रों में लिखी हैं, वे सब मुझे हुई थीं। बालवत्, उन्मत्तवत्, पिशाचवत्, जड़वत्।
“और शास्त्रों में जैसा लिखा है, वैसा दर्शन भी होता था।
“कभी देखता था, तमाम संसार जलता हुआ अंगार है।
“कभी देखता था, चारों ओर पारे जैसा सरोवर – झिलमिल झिलमिल कर रहा है। और कभी गली हुई चाँदी की तरह देखता था।
“कभी देखता था मानो मसालेवाली सलाई का चारों ओर उजाला हो रहा है।
“इनसे शास्त्रों की बातें मिल जाती हैं।
“फिर दिखलाया, वे ही जीव हैं, वे ही जगत् हैं और चौबीसों तत्त्व भी वे ही हुए हैं। छत पर चढ़कर फिर सीढ़ियों से उतरना। अनुलोम और विलोम!
“उः! किस अवस्था में उसने रखा है! – एक अवस्था जाती है तो दूसरी आती है! जैसे ढेकी के वार। एक ओर नीचा होता है तो दूसरी ओर ऊँचा हो जाता है।
“जब अन्तर्मुख होकर समाधिलीन हो जाता हूँ, तब भी देखता हूँ, वे ही हैं और जब बाहरी संसार में मन आता है, तब भी देखता हूँ, वे ही हैं।
“जब आईने के इस ओर देखता हूँ, तब भी वे ही हैं और जब उस ओर देखता हूँ,