श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'
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Read in context६२८ श्रीरामकृष्णवचनामृत १९ सितम्बर, १८८४
“केवल शास्त्र पढ़ने से क्या होगा? शास्त्रों में बालू और चीनी का-सा मेल है। उससे चीनी का अंश निकालना बड़ा मुश्किल है। इसीलिए शास्त्रों का मर्म गुरु के श्रीमुख से, साधु के श्रीमुख से सुन लेना चाहिए। तब फिर ग्रन्थों की क्या जरूरत है?
“चिट्ठी में खबर आई है, 'पाँच सेर सन्देश भेजियेगा – और एक धारीदार धोती।' चिट्ठी खो गयी, तब तुरन्त चारों ओर ढूँढ-तलाश होने लगी। बहुत कुछ खोजने के बाद कहीं चिट्ठी मिली। पढ़कर देखा, लिखा हैं – 'पाँच सेर सन्देश भेजियेगा और एक धारीदार धोती।' तब फिर उसने चिट्ठी फेंक दी। अब उसकी क्या जरूरत है? – अब तो सन्देश और धोती संग्रह करने से ही काम है।
(मुखर्जी, बाबूराम, आदि भक्तों से) “भलीभाँति खोज लेकर तब डूबो। तालाब में अमुक स्थान पर लोटा गिर गया है, जगह की ठीक जाँच करके डुबकी लगानी चाहिए।
“शास्त्रों का मर्म गुरु के श्रीमुख से सुनकर तब साधना की जाती है। यह साधना ठीक ठीक करने पर तब कहीं प्रत्यक्ष दर्शन होते हैं।
“डुबकी लगाओगे तब ठीक ठीक साधना होगी। बैठे बैठे शास्त्रों की बात पर केवल विचार करते रहने से क्या होगा? साधक को डुबकी लगानी चाहिए।
“अगर कहो कि डुबकी लगाने से भी तो मगर और घड़ियाल का डर हैं, – काम क्रोधादि का भय है, तो हल्दी लगाकर डुबकी लगाओ तो फिर वे पास न आ सकेंगे। विवेक और वैराग्य हल्दी हैं।”
(६)
पूर्व कथा। श्रीरामकृष्ण की पुराण, तन्त्र तथा वेद मत की साधना
श्रीरामकृष्ण – (भक्तों से) – उन्होंने मुझसे अनेक प्रकार की साधनाएँ करायीं। पहली पुराण मत की थी, फिर तन्त्र मत की थी, इसके बादवाली वेद मत की थी। पहले मैं पंचवटी में साधना करता था। वहाँ तुलसी-वन लगाया गया, मैं उसके भीतर बैठकर ध्यान करता था। कभी विकल होकर 'माँ-माँ' कहकर पुकारता था, कभी 'राम-राम' कहता था।
“जब 'राम-राम' कहता था, तब हनुमान के भाव में आकर एक पूँछ लगाकर बैठा रहता था – उन्माद की अवस्था थी। उस समय पूजा करते हुए मैं पीताम्बर पहनता था तो बड़ा आनन्द आता था। वह पूजा का ही आनन्द था।
“तन्त्र मत की साधना बेल के नीचे की थी। तब तुलसी का पेड़ और सहजन की फल्ली ये एक जैसे जान पड़ते थे।
“उस अवस्था में शिवानी की जूठन तमाम रात पड़ी रहती थी, साँप खाता था या कौन खाता था इसका कुछ ख्याल न था, वही जूठन मैं खाता था।