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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'

DevanagariHindipublished711 pages

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Page 618
७ सितम्बर, १८८४परिच्छेद ८९५९५

श्रीरामकृष्ण विश्राम कर रहे हैं। इधर पंचवटी में और बकुल के पेड़ के नीचे कुछ भक्त बैठे हुए हैं - दोनों मुखर्जी भाई, चुनीलाल, हरिपद, भवनाथ और तारक। तारक वृन्दावन से अभी अभी लौटे हैं। भक्तगण उनसे वृन्दावन की बातें सुन रहे हैं। तारक नित्यगोपाल के साथ अब तक वृन्दावन में थे।

(३)

कीर्तनानन्द में

श्रीरामकृष्ण जरा विश्राम कर रहे हैं। श्यामदास माथुर अपने आदमियों को लेकर कीर्तन गा रहे हैं - 'सुखमय सायर (सागर) मरुभूमि भइल, जलद निहारइ चातकि मरि गइला।' श्रीराधा का यह विरह-वर्णन हो रहा है। सुनकर श्रीरामकृष्ण को भावावेश हो रहा है। वे छोटी खाट पर बैठे हुए हैं। बाबूराम, निरंजन, राम, मनोमोहन, मास्टर, सुरेन्द्र, भवनाथ आदि भक्त जमीन पर बैठे हैं। गाना जम नहीं रहा है।

कोन्नगर के नवाई चैतन्य से श्रीरामकृष्ण कीर्तन करने के लिए कह रहे हैं। नवाई मनोमोहन के चाचा हैं। पेन्शन लेकर कोन्नगर में श्रीगंगाजी के तट पर भजन-साधन करते हैं। श्रीरामकृष्ण का प्रायः दर्शन करने आते हैं।

नवाई उच्च कण्ठ से संकीर्तन कर रहे हैं। श्रीरामकृष्ण आसन छोड़कर नृत्य करने लगे। साथ ही नवाई और भक्तगण उन्हें घेरकर नृत्य करने लगे। कीर्तन खूब जम गया। महिमाचरण भी श्रीरामकृष्ण के साथ नृत्य कर रहे हैं।

कीर्तन हो जाने पर श्रीरामकृष्ण अपने आसन पर बैठे। हरिनाम के बाद अब आनन्दमयी का नाम ले रहे हैं। श्रीरामकृष्ण भावपूर्ण हैं। नाम लेते हुए ऊर्ध्वदृष्टि हो रहे हैं।

गाना - "माँ, आनन्दमयी होकर मुझे निरानन्द न करना।"

गाना - "उसका चिन्तन करने पर भाव का उदय होता है। जैसा भाव होता है, फल भी वैसा ही मिलता है। इसकी जड़ विश्वास है। जो काली का भक्त है, उसे तो जीवन्मुक्त कहना चाहिए। वह सदा ही आनन्द में रहता है। अगर उनके चरणरूपी सुधा-सरोवर में चित्त लगा रहा तो समझना चाहिए, उसके लिए पूजा, जप, होम, बलि, ये सब कुछ भी नहीं हैं।"

श्रीरामकृष्ण ने तीन-चार गाने और गाये। अन्त में जो पद उन्होंने गाया, उसका भाव यह है - "मन! आदरणीया श्यामा माँ को यत्नपूर्वक हृदय में रखना। तू देख और मैं देखूँ, कोई दूसरा उन्हें न देखने पाये।"

यह गाना गाते हुए श्रीरामकृष्ण जैसे खड़े हो गये। माता के प्रेम में पागल हो गये। 'आदरणीया श्यामा माँ को हृदय में रखना' यह इतना अंश बार बार भक्तों को गाकर सुना रहे हैं। शराब पीकर मतवाले हुए की तरह सब को गाकर सुना रहे हैं। श्रीरामकृष्ण गाते