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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'

DevanagariHindipublished711 pages

Page 613 of 711

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Page 613

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परिच्छेद ८९

प्रवृत्ति या निवृत्ति?

(१)

दक्षिणेश्वर में राम, बाबूराम आदि भक्तों के संग में

श्रीरामकृष्ण दक्षिणेश्वर मन्दिर में, अपने उसी कमरे में छोटी खाट पर भक्तों के साथ बैठे हैं। दिन के ग्यारह बजे होंगे, अभी उन्होंने भोजन नहीं किया।

कल शनिवार को श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ श्रीयुत अधर सेन के यहाँ गये थे। नाम-संकीर्तन के महोत्सव द्वारा भक्तों का जीवन सफल कर आये थे। आज यहाँ श्यामदास का कीर्तन होगा। श्रीरामकृष्ण को कीर्तनानन्द में देखने के लिए बहुत से भक्तों का समागम हो रहा है।

पहले बाबूराम, मास्टर, श्रीरामपुर के ब्राह्मण, मनोमोहन, भवनाथ, किशोरीलाल आये; फिर चुनीलाल, हरिपद, दोनों मुखर्जी भ्राता, राम, सुरेन्द्र, तारक, अधर और निरंजन आये। लाटू, हरीश और हाजरा आजकल दक्षिणेश्वर में ही रहते हैं। श्रीयुत रामलाल काली की पूजा करते हैं और श्रीरामकृष्ण की भी देखरेख रखते हैं। श्रीयुत राम चक्रवर्ती पर विष्णुमन्दिर की पूजा का भार है। लाटू और हरीश, दोनों श्रीरामकृष्ण की सेवा करते हैं। आज रविवार है, ७ सितम्बर, १८८४।

मास्टर के आकर प्रणाम करने पर श्रीरामकृष्ण ने पूछा, नरेन्द्र नहीं आया ?

उस दिन नरेन्द्र नहीं आ सके। श्रीरामपुर के ब्राह्मण, रामप्रसाद के गाने की किताब लेते आये हैं और उसी पुस्तक से गाने पढ़-पढ़कर श्रीरामकृष्ण को सुना रहे हैं।

श्रीरामकृष्ण – हाँ पढ़ो।

ब्राह्मण एक गीत पढ़कर सुनाने लगे। उसमें लिखा था – माँ वस्त्र धारण करो।

श्रीरामकृष्ण – यह सब रहने दो, विकट गीत। ऐसा कोई गीत पढ़ो जिसमें भक्ति हो।

ब्राह्मण – कौन कहे कि काली कैसी है, षड्दर्शनों को भी जिसके दर्शन नहीं होते।

श्रीरामकृष्ण – (मास्टर से) – कल अधर सेन के यहाँ भावावस्था में एक ही तरह बैठे रहने के कारण पैरों में दर्द होने लगा था। इसीलिए बाबूराम को ले जाया करता हूँ।

CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar