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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'

DevanagariHindipublished711 pages

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५८८ | श्रीरामकृष्णवचनामृत | ६ सितम्बर, १८८४

सिहोड़ में - हृदय के घर में वह हुई थी।

हाजरा - वह एक वैष्णव है - मेरे साथ आपके दर्शन करने आया था। ज्योंही आकर बैठा कि आप उसकी ओर पीठ फेरकर बैठ गये।

श्रीरामकृष्ण - सुना, अपनी मौसी से फँसा था - पीछे से पता चला। (नरेन्द्र से) पहले तू कहता था, ये सब मेरे मन के विकार हैं।

नरेन्द्र - मैं तब जानता थोड़े ही था। अब तो कई बार देखा - सब मिलते हैं।

नरेन्द्र के कहने का तात्पर्य यह है कि श्रीरामकृष्ण भावावस्था में लोगों का अन्तर भी देख लेते हैं। इसी की उन्होंने कितनी ही बार परीक्षा ली है।

श्रीरामकृष्ण और भक्तों की सेवा के लिए अधर ने बड़ा इन्तजाम किया है। उन्होंने भोजन के लिए सब को बुलाया।

महेन्द्र और प्रियनाथ, दोनों मुखर्जी भाइयों से श्रीरामकृष्ण कह रहे हैं, क्यों जी, तुम भोजन करने न चलोगे?

उन्होंने विनयपूर्वक कहा - जी, हमें अब रहने दीजिये।

श्रीरामकृष्ण - (सहास्य) - ये लोग सब कुछ करते हैं। बस इतने ही से इन्हें संकोच है।

“एक औरत के जेठों के नाम हरि और कृष्ण थे। उसे हरिनाम तो कहना ही होगा। इधर 'हरे कृष्ण' कहने से जेठों के नाम आते थे। इसलिए वह जपत्ती थी -

'फरे फृष्ट, फरे फृष्ट, फृष्ट फृष्ट फरे फरे
फरे राम, फरे राम, राम राम फरे फरे।' ”

अधर जाति के स्वर्णवणिक थे। इसीलिए कोई-कोई ब्राह्मण भक्त उनके यहाँ भोजन करते हुए संकोच करते थे। कुछ दिन बाद जब उन्होंने देखा, श्रीरामकृष्ण स्वयं भोजन कर रहे हैं, तब उनका वह भाव दूर हो गया।

रात के नौ बजे नरेन्द्र, भवनाथ आदि भक्तों के साथ आनन्दपूर्वक श्रीरामकृष्ण ने भोजन किया।

अब बैठकखाने में आकर विश्राम कर रहे हैं। फिर दक्षिणेश्वर लौटने का उद्योग होने लगा।

कल रविवार है। दक्षिणेश्वर में श्रीरामकृष्ण के आनन्द के लिए मुखर्जी भ्राताओं ने कीर्तन का बन्दोबस्त किया है। श्यामदास कीर्तनाये का गाना होगा। श्यामदास को अपने यहाँ बुलाकर राम ने कीर्तन सीखा था।

श्रीरामकृष्ण नरेन्द्र से कल दक्षिणेश्वर जाने के लिए कह रहे हैं।

श्रीरामकृष्ण - (नरेन्द्र से) - कल जाना, अच्छा?

नरेन्द्र - अच्छा जी, जाने की कोशिश करूँगा।