श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'
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५६२ श्रीरामकृष्णवचनामृत ३० जून, १८८४
पण्डितजी – जो व्रत मैंने लिया है, क्या इसे अध्यवसाय के साथ पूरा करने की कोशिश करूँ?
श्रीरामकृष्ण ने जैसे अनुरोध की रक्षा के लिए कहा, 'हाँ होगा,' परन्तु इस बात को दबाने के लिए दूसरा प्रसंग उठा दिया।
श्रीरामकृष्ण – शक्ति को मानना चाहिए। विद्यासागर ने कहा, क्या उन्होंने किसी को ज्यादा शक्ति भी दी है? मैंने कहा, नहीं तो फिर एक आदमी सौ आदमियों को कैसे मार डालता है? क्वीन विक्टोरिया का इतना मान – इतना नाम क्यों है अगर उनमें शक्ति न होती? मैंने पूछा, तुम यह मानते हो या नहीं? तब उसने कहा, हाँ, मानता हूँ।
पण्डितजी उठे और श्रीरामकृष्ण को भूमिष्ठ हो प्रणाम किया। साथवाले उनके मित्रों ने भी प्रणाम किया।
श्रीरामकृष्ण कहते हैं – "फिर आना। गंजेड़ी गंजेड़ी को देखता है, तो खुश होता है; कभी तो उसे गले से लगा लेता है। दूसरे आदमी देखकर मुँह छिपाते हैं। गाय अपने साथ की गायों को देखती है तो उनकी देह चाटती है, पर दूसरी गायों को सिर से ठोकर मारती है।" (सब हँसते हैं।)
पण्डितजी के चले जाने पर श्रीरामकृष्ण हँस हँसकर कह रहे हैं – "डाइल्यूट (Dilute = मुग्ध) हो गया है, एक ही दिन में। देखा, कैसा विनय-भाव है, और सब बातें समझकर ग्रहण कर लेता है।"
आषाढ़ की शुक्ला सप्तमी है। पश्चिमवाले बरामदे में चाँदनी छिटक रही है। श्रीरामकृष्ण अब भी वहीं बैठे हैं। मास्टर प्रणाम कर रहे हैं। श्रीरामकृष्ण स्नेहपूर्वक पूछ रहे हैं, क्या जाओगे?
मास्टर – जी हाँ, अब चलता हूँ।
श्रीरामकृष्ण – एक दिन मैंने सोचा कि सब के यहाँ एक-एक बार जाऊँगा – क्यों?
मास्टर – जी हाँ, बड़ी कृपा होगी।
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CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar